भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बहुत गई थोड़ी रही, थोड़ी भी अब जाय।

कहे नाट सुन नायिका, तालमैं भंग न पाय ॥

एक तपस्वी भी वहाँ तमाशा देख रहा था। उसने ये सवाल-जवाब सुनते हो नट-जो अपना कम्बल दे दिया, राजाके लड़केने उसे अपनी हीरोंकी जड़ाऊ कड़ाँकी जोड़ी दे दी और राजकन्याने अपने गलेका हीरोंका हार दे दिया।

राजा यह सब देखकर चकित हो गया। उसने सबसे पहले तपस्वीसे पूछा—“तुम्हारे पास यही एक कम्बल था। तुमने क्या समझ कर उसे कम्बल दे दिया?” तपस्वीने कहा—“आपके ऐश्वर्य्यको देखकर मेरे मनमें भोगोंकी वासना उठ खड़ी हुई थी; पर नटके दोहेसे मेरा विचार बदल गया। मैंने उससे यह उपदेश ग्रहण किया कि, बहुत सी आयु तो तप में बीत गई; अब जो थोड़ीसी रह गई है, उसे भोगोंकी वासनामें क्यों खराब करूँ? मुझे नटसे उपदेश मिला, इससे मैंने अपना एकमात्र कम्बल—अपना सर्वस्व उसे दे दिया।”

इसके बाद राजाने राजपुत्रसे पूछा—“तुमने क्या समझकर अपनी वेशकीमत्त कड़ाँकी जोड़ी उसे दे दी?” राजपुत्रने कहा—“मैं बड़ा दुखी रहता हूँ, क्योंकि मुझे आप कुछ भी खर्च करने नहीं देते। दुखी होकर मैंने यह विचार कर रखा था कि, किसी दिन राजाको विष देकर मरवा दूँगा; पर इस नटके दोहेसे मुझे यह उपदेश हुआ है कि, राजाकी बहुत सी