वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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आयु तो बीत गई, अब वह बूढ़ा हो गया है ; दो-चार बरसकी बात और है ; इस अंतमें वह आपही मर जायगा, अतः पितृहत्या क्यों की जाय ? इसी उपदेशके बदलेमें मैंने नटको कड़ोंकी जोड़ी दे दी ।”
फिर राजाने राजकन्यासे पूछा—“तुमने अपना क्रौमता हार नटको क्यों दिया ?” कन्याने कहा—मेरी जवाननी आ गई है ; आप स्वर्चके भयसे मेरो शादी नहीं करते । कामदेव बड़ा बलवान है । कामकी प्रबलताके मारे, मेरा चिवार वजीरके लड़केके साथ निकल भागनेका था ; पर नटके दोहेसे मुझे यह उपदेश मिला कि, राजाकी बहुवसी आयु तो चली गई ; अब जो शेष रह गई है, वह भी बीतने ही वाली है । थोड़े दिनोंके लिये, पिताके नाममें क्यों बड़ा लगाऊँ ? यह अनमोल उपदेश मुझे नटके दोहेसे मिला, इसी से मैंने अपना बहुव्यय हार उसे दे दिया । हे पिता ! नटके दोहेसे आपकी जान और इज्जत बचाई है ; अतः आपको भो उसे कुछ इनाम देना चाहिये ।” राजाने सब बातें सोच-समझ कर नटको इनाम दे विदा किया और वजीरके लड़केके साथ कन्याको शादो कर दी । राजगुरुको गद्दो देकर आप बेरागी हो गया और अपने शेष रही आयु आत्मविचारमें लगा दी । इसी तरह सभी संसारियोंको, अपनी शेष आयु सुखमें और ब्रह्मविचारमें लगा, जन्म-मरणसे पीछा लुड़ा, नित्य सुख-शान्ति लाभ करनी चाहिये ।