भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बाल-बच्चोंका क्या किया जाय ।

प्रथम तो स्त्री-पुत्र प्रभृति आपके कोई नहीं ; एक सराय के मुसाफिरके समान हैं । यहाँ आकर नाता जुड़ गया है । अपने-अपने टाइटम पर सब अपनी-अपनी राह लेंगे । इसके सिवा, ये आपसे सच्ची मुहब्बत भी नहीं करते । आपसे इनका काम निकलता है, पाप-पुण्यकी गठरी आप बाँधते हैं और सुख ये भोगते हैं ; इसीसे कोई आपको “बाबूजी”, कोई “चाचाजी” और कोई “नानाजी” कहता है । अगर आप इनकी ऊकुरतों या फरमायशोंको पूरी न करें, तो ये आपका नाम भी न लें । ऐसे स्वार्थी लोगोंको मिथ्या प्रीतिके फेरमें पड़कर, आप अपने अमूल्य और दुष्प्राप्य जीवनको क्यों नष्ट करते हैं ? जब आप इस देहको छोड़कर परलोकमें जायँगे, तब क्या ये आपके साथ जायँगे ? हरगिज नहीं । कोई पौली तक और कोई श्मशान तक आपकी लाशके साथ जायँगे । वहाँ पहुँच, आपको जला-बला खाक कर सब भूल जायँगे ।

आप भी मुसाफिर हैं और आपके स्त्री-पुत्र भी मुसाफिर हैं । आपकी अगली सफर बड़ी लम्बी है । यह तो बीचका एक मुकाम है । कर्म-भोग भोगनेको आप यहाँ ठहर गये और कर्मवश ही इन सबसे आपका मेल हो गया । ये अपनी सफर का प्रबन्ध करें चाहे न करें, पर आप तो अवश्य करें । इनके झूठे मोहमें आप न भूलें । अगर आप बाल-बच्चोंकी रोटी