भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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और कपड़ोंकी फिकमें लगे रहेंगे, तो यह फिक तो अन्त तक लगी ही रहेगी और आपको ले जानेवाली गोड़ी या मौत आ जायगी। उस समय बड़ी कठिनाई होगी। जो लोग उग्र-भर गृहस्थीके कर्मठोंमें लगे रहे, अन्तमें उनका बुरा ही हुआ। ये घर-भगड़े ही तो ईश्वर-दर्शन या स्वर्ग अथवा मोक्षकी प्राप्ति में बाधक हैं। महात्मा शैल सादीने कहा है :—

ऐ गिरफ़्तारे पाये बन्दे अयाल ।

दिगर आज्ञादगी मबन्द खयाल ॥

गुमें फ़रज़न्दो नानो जामग्रो कृत ।

बाजद थारद जे सेर दर मलकृत ॥

ऐ औलाद की मुहब्बतमें गिरफ़्तार रहनेवाले, तू किसी तरह भी बन्धन-मुक्त नहीं हो सकता। सन्तान, रोटी, कपड़ा तथा जीविका की फिक तुझे स्वर्गकी चिन्तासे रोकती है। इसलिये “सब तज और हर भज।”

क्या घरमें रह कर ईश्वर-उपासना

नहीं की जा सकती ?

घर-गृहस्थीमें रहकर ईश्वर की भक्ति और उपासना की जा सकती है; पर घरमें रह कर भक्ति करना है टेढ़ी खोर। जैसी संगति होती है, वैसा ही मनुष्य हो जाता है। ज्ञानियों