वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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की संगतिमें ज्ञानकी और स्त्रियोंकी सुहृदत्वमें कामकी उत्पत्ति होती है। घरमें रह कर वैराग्य की उत्पत्ति होना कठिन है। किसी कविने कहा है :—
जाइयो तहाँ ही जहाँ संग न कुसंग होय,
कायरके संग शूर भागे पर भागे है ॥
फूलन की वासना सुहाग भरे वासन पै,
कामिनीके संग काम जागे पर जागे है ॥
घर बसे घर पै बसो, घर वैराग कहाँ,
काम कोष लोभ मोह, पागे पर पागे है ।
काजरकी कोठरीमें, लाखहु सयानो जाय,
काजरकी एक रेख, लागे पर लागे है ॥
संसारियोंकी सङ्गतिमें मनुष्य संसारी हो जाता है ; विषय-भोगोंकी ओर ही उसका मन चलायमान होता है तथा स्त्री-पुत्र आदिकोंमें उसका राग बनाही रहता है ; पर जो वेदान्त-ग्रन्थोंको विचारते और महापुरुषोंकी सङ्गति करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध होते रहने की वजह से, उन्हें, गृहस्थाश्रम में ही, वैराग्य उत्पन्न होने लगता है। गृहस्थीमें एक न एक दुःख बना ही रहता है। उस दुःखके कारण, मनुष्यके मनमें वैराग्य भी पैदा होता रहता है। विषयोंमें दुःख समझना ही वैराग्यका और सुख समझना ही रागकर्म हेतु है। महामूर्दोंको भी कुछ न कुछ वैराग्य बना ही रहता है। जिस समय कोई कष्ट आता