भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 521, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 521

( ४०७ )

है, स्त्री-पुत्र आदि मर जाते हैं, धन नाश हो जाता है, तब मूढ़ भी अपने तर्क और संसारको धिक्कारता है ; लेकिन ज्योंही वह कष्ट दूर हो जाता है, उसका वैराग्य भी काफूर हो जाता है । पर, वास्तवमें, वैराग्यका कारण—है गृहस्थाश्रम ही ; क्योंकि बिना गृहस्थाश्रम तो किसी की उत्पत्ति होती ही नहीं । रामचन्द्र और वशिष्ठ प्रभृतिको गृहस्थाश्रममें ही वैराग्य हुआ था । और भी बड़े-बड़े संन्यासियोंको गृहस्थाश्रममें ही वैराग्य हुआ था । वैराग्य उत्पन्न होते ही, उन्होंने घर-गृहस्थी त्याग, वन की राह ली थी ।

यह बात भी नहीं है कि, गृहस्थाश्रममें ज्ञान होता ही न हो । जनकादिक महात्मा गृहस्थाश्रममें ही ज्ञानी हुए थे । ज्ञानका कारण “वैराग्य” है । जो गृहस्थ होकर, सदैव, वैराग्य और विचारमें मग्न रहता है, उसके ज्ञानी होनेमें सन्देह नहीं ; पर जो संन्यासी होकर भी भोगोंमें राग रखता है, उसके अज्ञानी होनेमें संशय नहीं । “वैराग्य” ही आत्मज्ञानको साधन है । मनुष्य—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यास—किसी आश्रममें क्यों न हो, बिना वैराग्यके ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना मोक्ष नहीं । जो पुरुष गृहस्थाश्रममें रह कर भी उसमें आसक्त नहीं होता, जलमें कमलकी तरह रहता है, उसको मुक्तिमें ज़रा भी सन्देह नहीं । एक दृष्टान्त इस-मौके का हमें याद आया है, उससे पाठकोंको अवश्य लाभ होगा :—