वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ४०७ )
है, स्त्री-पुत्र आदि मर जाते हैं, धन नाश हो जाता है, तब मूढ़ भी अपने तर्क और संसारको धिक्कारता है ; लेकिन ज्योंही वह कष्ट दूर हो जाता है, उसका वैराग्य भी काफूर हो जाता है । पर, वास्तवमें, वैराग्यका कारण—है गृहस्थाश्रम ही ; क्योंकि बिना गृहस्थाश्रम तो किसी की उत्पत्ति होती ही नहीं । रामचन्द्र और वशिष्ठ प्रभृतिको गृहस्थाश्रममें ही वैराग्य हुआ था । और भी बड़े-बड़े संन्यासियोंको गृहस्थाश्रममें ही वैराग्य हुआ था । वैराग्य उत्पन्न होते ही, उन्होंने घर-गृहस्थी त्याग, वन की राह ली थी ।
यह बात भी नहीं है कि, गृहस्थाश्रममें ज्ञान होता ही न हो । जनकादिक महात्मा गृहस्थाश्रममें ही ज्ञानी हुए थे । ज्ञानका कारण “वैराग्य” है । जो गृहस्थ होकर, सदैव, वैराग्य और विचारमें मग्न रहता है, उसके ज्ञानी होनेमें सन्देह नहीं ; पर जो संन्यासी होकर भी भोगोंमें राग रखता है, उसके अज्ञानी होनेमें संशय नहीं । “वैराग्य” ही आत्मज्ञानको साधन है । मनुष्य—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यास—किसी आश्रममें क्यों न हो, बिना वैराग्यके ज्ञान नहीं और ज्ञान बिना मोक्ष नहीं । जो पुरुष गृहस्थाश्रममें रह कर भी उसमें आसक्त नहीं होता, जलमें कमलकी तरह रहता है, उसको मुक्तिमें ज़रा भी सन्देह नहीं । एक दृष्टान्त इस-मौके का हमें याद आया है, उससे पाठकोंको अवश्य लाभ होगा :—
( ४०८ )
राजा जनक और शुक्रदेव जी ।
एक बार व्यास जीने शुक्रदेव जीसे कहा कि, तुम राजा जनकके पास जाकर उपदेश लो । शुक्रदेव जी जनकके द्वार पर गये । भीतर खबर कराई, तो राजाने कहला भेजा कि, द्वार पर ठहरो । शुक्रदेव जी तीन दिन तक द्वार पर खड़े रहे, पर उन्हें क्रोध न आया । राजाने उनके क्रोधकी परीक्षा करनेके लिये ही, उन्हें, तीन दिन तक, द्वार पर खड़ा रक्खा और चौथे दिन अपने पास बुलाया । वहाँ जाकर शुक्रदेव जी क्या देखते हैं कि, राजा जनक सोनेके जड़ाऊ सिंहासन पर बैठे हैं, सुन्दरी नवयौवना स्त्रियाँ उनके चरण दाब रही हैं और कुछ मोरछल और पक्षु कर रही हैं । जगह-जगह विषय-भोग या ऐश-आरामके सामान घरे हैं । सामने ही सुन्दरी नर्तकियाँ नाच कर रही हैं । यह हाल देखकर, शुक्रदेव जीके मनमें राजाकी ओरसे घृणा हुई । उन्होंने मनमें कहा—“नाम बड़े और दर्शन छोटे” वाली बात है । यह तो भोगोंमें आसक्त है ; पिताजीने इन्हें परम ज्ञानी क्यों कहा ? राजा जनक शुक्रदेव जीके मनकी बात ताड़ गये । देवात ; उसी समय मिथिलापुरीमें जोरसे आग लग गई । बाहरसे दूत दौड़े आये और कहने लगे—“महाराज ! पुरीमें आग लग गई है और राजद्वार तक आ पहुँची है ।” शुक्रदेव जी मनमें सोचने लगे कि, मेरा
( ४०६ )
दृण्ड-कमण्डल बाहर रक्खा है, कहीं वह न जल जाय । उस समय राजाने कहा—
“अनन्तवत्तु मे वित्तं यन्मे नास्ति हि किञ्चन मिथिलायां प्रदग्धायाम् न मे दद्याति किञ्चन ।”
मेरा आत्मरूप-धन अनन्त है । उसका अन्त कदापि नहीं हो सकता । इस मिथिलाके जलनेसे तो मेरा कुछ भी नहीं जल सकता ।
राजा जनकके इस वाक्यसे पदार्थोंमें उनको आसक्ति नहीं—अनासक्ति ही साबित होती है । अगर कोई मनुष्य, गृहस्थोंमें रह कर, स्त्री-पुत्र-धन प्रभृतिमें अनासक्त रहे, उनमें ममता न रक्खे, चाहे व्यवहार सब तरहके करे, वह सच्चा ज्ञानी है, उसको मोक्ष अवश्य होगी ।
ममता ही दुःखोंका कारण है । जिसकी किसी भी पदार्थ में ममता नहीं, उसे दुःख क्यों होने लगा ? उसकी ओरसे वह पदार्थ मिले तो अच्छा, न मिले तो अच्छा ; बचा रहे तो भला और नष्ट हो जाय तो भला । जिसकी जिस चीज़में ममता होती है, उसे उस चीज़के नाश होने या उसके न मिलनेसे अवश्य दुःख होता है । कहा है ।
यस्मिन् वस्तुनि ममता मम नायस्तत्र तत्रैव ।
यत्वेवाहमुदासे मुदा स्वभाव सन्तुष्टः ॥
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जिस-जिस चीज़में मनुष्यकी ममता है, वही-वही दुःखी है और जिस जिससे उसे उदासीनता है, वही सन्तुष्टता है। मत-लब यह कि, “ममता” ही दुःखोंका मूल है। घर-गृहस्थीमें रहो और गृहस्थोंके सारे कार्य-व्यवहार करो ; पर किसी भी पदार्थ में ममता मत रखो। तुम्हारी ओरसे कोई मर जाय तो शोक नहीं, धन-दौलत नष्ट हो जाय तो रंज नहीं, आ जाय तो खुशी नहीं ; इस तरह उदासीन-भाव रखो। अगर इस तरह गृहस्थी में रहो, तो तुमसे बढ़कर ज्ञानी कौन है ? तुम्हें अवश्य मोक्षपद मिलेगा।
निर्मीही पुरुष ।
—○—
एक मनुष्यके एक ही लड़का था ! लड़का जवान हो गया था । उसकी शादी भी हो गई थी । एक दिन पिताने किसी उद्देश्यसे शामको एक सभा बुलानेका निमन्त्रण दिया । देवयोगसे, दोपहरको उसका पुत्र अचानक मर गया । उसने उसकी लाशको बैठकमें लिटा कर, ऊपरसे कपड़ा उड़ा दिया और आप द्वार पर बैठकर शान्त-भावसे हुक्का पीने लगा । इतनेमें सभाका समय हो गया ; मित्र लोग आने लगे । उदमें से एक मित्र उसी बैठकमें किसी ज़रूरी कामसे गया । वहाँ एक लाश पड़ी देख, उसने बाहर आकर पूछा,— “यह क्या !”
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उसने कहा—“भाई ! लड़का मर गया है । पहले सभाका काम कर ले ; तब सब मिल कर इसे श्मशान-घाट पर ले चलेंगे ।” मित्र लोग उस निर्मोही पिताकी बात सुनकर चकित हो गये । उन्होंने कहा—“तुम तो अजब आदमी हो ! तुम्हें अपने इकलौते जवान पुत्रका भी रक्ष नहीं ! उसने कहा—“भाई ! मेरा इसका क्या नाता ? हम सब सरायके मुसाफिर हैं । पूर्वजन्मके कर्मवश, एक दूसरेसे मिल गये हैं । अपना-अपना समय होनेसे, अपनी-अपनी राह चले जा रहे हैं ; इसमें रक्ष या शोककी बात ही क्या है ?” ऐसे ही मनुष्य, गृहस्थीमें रहकर भी, जन्म-मरणके फन्देसे छूटकर, मोक्ष लाभ करते और जीवनमुक्त कहलाते हैं ।
काम करो, पर मनको ईश्वरमें रखो ।
— * —
अगर भगवान् कृष्णके कथनानुसार संसारके काम-धन्धे किये जाय, तोभी हर्ज नहीं ; पर मनको संसारी पदार्थों या विषय-भोगोंसे हटाकर एकमात्र भगवान्में लगाना चाहिये । दुनियाची काम करते रहने और मनको भगवान्में लगाये रहने से सिद्धि मिल सकती है । महाकवि रहीम कहते हैं :—
दोहा ।
जो “रहीम” मन हाथ है, मनसा कई किन जाहि । जलमें जो छाया परी, काया भीजत नाहि ॥
( ४१२ )
सारा द्वारमद्वार मन पर है। व्यवभिचारिणी ली धरके धन्धे किया करती है, पर मनको हर क्षण अपने थारमें रखती है। गाय जहाँ-तहाँ घास खरती-फिरती है, पर मनको अपने बन्धनेमें रखती है। स्त्रियाँ जब ध्यान कूटती हैं, तब एक हाथसे मूसल चढ़ाती हैं और दूसरेसे ओखलीके धानको ठीक करतो जाती हैं। इसी बौधमें यदि उनका बच्चा आ जाता है, तो उसे दूध भी पिलाती रहती है; किन्तु उनका ध्यान बराबर मूसलमें ही रहता है। अगर जूरा भी ध्यान टूटे, तो हाथके पल्लस्तर उड़ जायँ। इसी तरह मनुष्य, यदि संसारके काम-धन्धे करता हुआ भी, ईश्वरमें मन लगाकर उसकी भक्ति करता रहे, तो कोई हर्ज नहीं; उसे भगवत्-दर्शन अवश्य होगा। यद्यपि इस तरह संसारमें रहकर सिद्धि लाभ करना—है बड़े शूरवीरोंका काम; तोभी इस तरह अनेक लोग, गृहस्थोंमें रहते हुए भी, मोक्ष-पद पा गये हैं।
ईश्वर-प्राप्तिकी सहज राह कौनसी है ?
गृहस्थीमें रहने की अपेक्षा, गृहस्थी त्यागकर, वनके एकान्त भागमें रहकर, भगवत्में मन लगाना अवश्य आसान है।* गृहस्थीमें रहनेसे मन विषय-भोगोंकी ओर दौड़ता ही है। खीको देखनेसे काम जागता ही है; पर न देखनेसे मन नहीं चलता। पराशर ऋषिने मतस्यगन्धा देखी, तो उनका मन चलायमान हुआ। विश्वामित्रने मेनका देखी तो उनका मन
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बिगड़ा। शिवने मोहिनी देखी, तो उनका मन चञ्चल हुआ। इसीलिये पहलेके अनेक महापुरुष अपने-अपने घर त्यागकर बनमें चले गये और वहाँ उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई। पर बनमें जाकर भी, जो मनको विषयों में लगाने रहते हैं, ममताको नहीं त्यागते; कामनाको नहीं छोड़ते, वे गृहस्थोंसे भी बुरे हैं। वे धोबीके कुत्तेकी तरह घरके न बाटके।
त्यागमें ही सुख है।
—○—
जो धन-दौलत, राजपाट, स्त्री-पुत्र प्रभृतिको त्याग कर बनमें रहते हैं; किसी भी चीज़ की इच्छा नहीं रखते, यहाँ तक कि, खानेके लिये पाव-भर आटेकी भी जरूरत नहीं रखते; जहाँ जगह पाते हैं वहाँ पड़ रहते हैं; जो मिल जाता है, उसीसे पेट भर लेते हैं,—वे सच्चमुच ही सुखी हैं। शङ्कराचार्य्य महाराजने “मोहमुद्गर” में कहा है—
सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः,
शय्याभूतलभजिनंवासः।
सर्वपरिग्रहभोगत्यागः,
कथ्य सुखं न करोति विरागः ॥
जो देवमन्दिर या पेड़के नीचे पड़े रहते हैं, ज़मीन ही जिनकी चारपाई है, मुगड़ाला ही जिनका वस्त्र है, सारे विषय-
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भोगके सामान जिन्होंने त्याग दिये हैं ; यानी वासना-रहित हो गये हैं,—ऐसे किन मनुष्योंको सुख नहीं है? अर्थात् ऐसे त्यागी सदा सुखी हैं।
देहके नहीं मनके वैराग्यसे लाभ है।
— * —
अनेक लोग गेहूँ कपड़े पहन लेते हैं, लम्बी-लम्बी मालाये गलेमें डाल लेते हैं, लिलक-छापे या राख लगा लेते हैं ; पर उनका मन सदा भोगोंमें लगा रहता है। वे शरीरको वैरागियोंका सा बना लेते हैं ; पर मन उनका भोगियोंका सा रहता है ; इसलिये उनका जन्म नृश जाता है। आजकल साधू-संन्यासी बनना एक प्रकारका रोज्गार हो गया है। जिनसे किसी तरहकी मिहन्त-मत्तदूरी नहीं होती, वे साधु-वेध बनाकर लोगोंको ठगते और घर मनी-बाडर भेजते हैं। बहुतसे लोगों नगरोंमें आकर बड़े आदमियोंके यहाँ डरे लगा देते हैं, चेड़े-बैठियोंसे भेंट लेते हैं, नवयौवना सुन्दरियोंको पास बैठाकर उपदेश देते हैं, अपने क्रदमोंमें रुपये और अशक्तियोंके हेर लगवाते हैं। भला ऐलोंका मन परमात्मामें लग सकता है? जब विश्वाभिन्न और पराशर जैसे, हवा और पानी पर गुज़ारा करनेवाले, मुनियोंका मन स्त्रियोंको देखते ही चञ्चल हो गया ; तब रबड़ी-मलाई और मावा-मोहनभोग उड़ाने
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बालोंका मन कैसे स्वियोंपर न चलेगा ? ऐसा कौन है, जिसका मन स्वियोंने खण्डित नहीं किया ? कहा है—
कोऽर्थान् प्राप्य न गर्विता ?
विषमिषः कस्यापदो नागता : ?
क्षीमिः कस्य न खण्डितं सुवि मनः ?
को नाम राज्ञां प्रियः ?
कः कालस्य न गोबरान्तरगतः ?
कोऽर्थी गतो गौरव ?
को वा दुर्जन-वागुग्रा-निपतितः
क्षेमेण यातः पुमान् ?
किसको धन पाकर गर्व नहीं हुआ ? किस विषयी पर आफ़्त नहीं आई ? पृथ्वी पर किसका मन नारीने आकृष्ट नहीं किया ? कौन राजाओंका प्यारा हुआ ? कौन कालकी नजरसे बचा ? किस मँगतेका गौरव हुआ ? कौन सज्जन दुष्टोंके जालमें फँसकर कुशलसे रहा ?
संन्यासियोंको स्त्री-दर्शन भी मना है ।
धर्मशास्त्रमें लिखा है :—
सम्भाषयेत् क्षिप्रं तैव, पूर्वदृष्टं च न स्मरेत् । कथां च वजयेत्तासां, नो पर्येक्षिष्वितामपि ॥
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यस्तु प्रवजितो भूत्वा पुनः सेवेतु मैथुनम् ।
षष्ठिवर्षसहस्राणि विष्णुयां जायते क्रुमिः ॥
यतिको स्त्रीसे बात न करनी चाहिये, पहलेकी देखी हुई स्त्रीकी याद न करना चाहिये तथा स्त्रियोंकी चर्चा भी न करनी चाहिये और स्त्रीका चित्र भी न देखना चाहिये ।
जो संन्यासी होकर स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ६० हजार वर्ष तक विष्णुका कीड़ा होता है ।
और विषयोंसे मनको रोकना उतना कठिन नहीं, जितना कि स्त्रीसे रोकना कठिन है ; इसीसे स्त्रीका चित्र तक देखनेकी मनाही की है । जो ढोंगी साधु-सन्यासी दुनियादारोंके घर आते और स्त्रियोंमें बैठे रहते हैं, उनको उपदेश ग्रहण करना चाहिये ।
ढोंगी साधुओंके लिये अमूल्य उपदेश ।
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बनावटी या ढोंगी साधुओंके सम्बन्धमें महात्मा तुलसी- दासजीने कहा है :—
तनको योगी सब करें, मनको विरला कोय ।
सहजे सब सिधि पाइये, जो मन योगी होय ॥१॥
जाके उर बर वासन्य, भई भास कछु आन ।
तुलसी ताहि बिड-बना, केहि बिधि कथहि प्रमान ॥२॥
( ४१७ )
काह भयो बन बन फिरे, जो बनि आगो नाहिं । बनते बनते बनि गयो, तुलसी घर ही माहिं ॥३॥ रामचरण परचे नहीं, बिन साधन पद-नेह । मुँड़ मुड़ायो बादिही, भाँड़ भये तजि गेह ॥४॥ कीर सरस वाणी पढ़त, चाखत चाहन खोंड़ । मन राखत वैराग महँ, घरमें राखत राँड़ ॥५॥ जहाँ काम तहँ राम नहीं, जहाँ राम नहीं काम । तुलसी दोनों नहीं मिलें, रवि रजनी इक ठाम ॥६॥ तब लगि योगी जगत्-गुरु, जब लगि रहै निरास । जब आशा मनमें जगी, जग गुरु योगी दास ॥७॥
( १ )
शरीरको योगी बहुत लोग करते हैं ; पर मनको कोई विरला ही योगी करता है ; अगर मन योगी हो जाता है ; तो सहजमें सिद्धि या मोक्ष मिल जाती है । दूसरे शब्दोंमें यों समझिये कि, लोग शेष तो संन्यासी-महात्माओंकासा कर लेते हैं ; पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है ; इसलिये उनको कुछ भी लाभ नहीं होता,—सिद्धि नहीं मिलती । अगर वे लोग शरीरको चाहे गृहस्थोंकासा रखें, उत्तमसे उत्तम खाने खाद्य, बढ़ियासे बढ़िया कपड़े पहने ; पर मनमें स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, नाच-रङ्ग आदिकी वासना और ममता न रखें ; तो उन्हें निश्चय ही सिद्धि मिल
२७
( ४१८ )
सकती है। मतलब यह कि, मनके योगी होनेसे सिद्धि मिलती है; कपड़े रँगने, माथा मुँडाने और डण्ड-कमण्डल प्रभृति रखनेसे सिद्धि नहीं मिलती।
( २ )
जिसके विशुद्ध हरि-भक्तिपूर्ण हृदयमें काम, लोभ और मोह प्रभृतिकी वासना पैदा हो जाती है, वह अपनी वासना पूरी करनेके लिये, नाना प्रकारके नोच कर्म करता है; फिर उसकी जो कृतीती और बदनामी होती है, उसका यथार्थ रूपमें वर्णन करना कठिन है। मतलब यह है कि, जिसके हृदय में केवल एक भगवान्को वासना होती है, उसका हृदय श्रेष्ठ और विशुद्ध समझा जाता है। यदि उसके हृदयमें इसके सिवा—भगवान्के अतिरिक्त और वासना उत्पन्न हो उठती है, उसका दिल धन-दौलत, स्त्री और राजपाट प्रभृतिपर चलायमान हो जाता है; तो उसकी संसारमें बड़ी बदनामी होती है। सारांश यह कि, यदि कोई संन्यासी, यति या हरिभक्त विषयोंको त्याग कर फिर विषयोंके जालमें फँसता है, राँड रखता है, इत्र फुलेल लगाता है, मलमल-खासा पहनता है और गद्दे तकियोंपर आराम करता है; तो उसकी वर्णनातीत अपकीर्ति होती है।
( ३ )
अगर कोई शस्त्र घर छोड़ कर और संन्यासी का भेष बना कर बन-बन फिरता है; पर उसका मन भगवान्में नहीं लगता, तो उसके घर छोड़ने और तकलीफ उठानेसे कोई लाभ नहीं।
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वह वैरागी तो बन जाता है, भेष तो संन्यासियों का सा घर लेता है ; पर उसका मन विषयोंमें लगा रहता है ; इसलिये वह धोबीके कुत्तेकी तरह घर और घाद कहीं का नहीं रहता ; लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो घरमें ही रहते हैं ; पर सत्संग करते और हरि-यश सुनते हैं। वे सत्सङ्ग के प्रभाव और गुरुकी व्यासे, विषयोंसे मनको हटाकर, ईश्वरके गुणगान करने लगते हैं। फिर ; धीरे-धीरे उनकी भक्ति ईश्वरमें बढ़ जाती है और वे सच्चे भक्त हो जाते हैं। अनेक लोग घरमें ही रहकर इस तरह सिद्धि लाभ कर चुके हैं। सारंगि यद, विषयोंसे मन खींच लेनेवाला, ममता और वाहना न रखने वाला गृहस्थ भला ; पर विषयोंमें मन रखनेवाला, ममता और वासनाको न त्यागने वाला त्यागी संन्यासी भला नहीं।
( ४ )
जिनका भगवान्के चरण-कमलोंमें सच्चा प्रेम नहीं है, जिनका हरिभक्तिके साधन—सन्तोंके वरणोंमें नेह नहीं है, जो महात्माओंकी सङ्कृति और पदचन्द्रना नहीं करते, वे वृथा ही घर छोड़, सिर मुँडा, भेष बदल कर भाँड़ हो गये हैं।
भाँड़ जिस तरह लोगोंको रिझाने और रुपया कमानेके लिये अनेक प्रकारके खाङ्ग धरते हैं ; उसी तरह आज-कल बहुतसे लोग रुपया कमाने और अपने तर्ज पुजवानेको संन्यासियोंका सा भेष बनाते हैं। • ये न तो भगवान्को जानते हैं और न उसके जाननेके लिये महात्माओंकी सङ्कृति और उनकी
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सेवा ही करते हैं। उन्हें सिर मुड़ाने, गेहूण कपड़े पहनने और घर त्यागने से कोई लाभ नहीं।
( ५ )
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो घर-गृहस्थीमें रहते हैं और शरीरसे अपने कुलके व्यवहार करते हैं; पर मनको सब ओरसे खींचकर, ममताको त्याग कर, उसे परमात्मामें लगाने हैं। प्रह्लाद और अम्बरीष प्रभृति ऐसे ही भक्त हो गये हैं। कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो तन और मन दोनोंसे ही ईश्वरकी भक्ति और उपासना करते हैं। नारद और शुक्रदेवकी गणना ऐसों में ही है। इन्होंने घर त्यागकर हरिभक्ति की। कुछ ऐसे लोग होते हैं कि, जो लोगोंको विभाने और हलवा-पूरी तथा खीर-खाँड़ उड़ानेके लिए, वेदान्त और पुराणोंको सीख लेते हैं और तोतेकी तरह मोठी-मोठी बातें बनावते हैं। सीधे-सादे भौद्ध लोग उनकी बातों पर रीक्ष कर, उन्हें रबड़ी-मलाई और मोहन-भोग खिलाते हैं। इन भालों के खानेसे जब कामदेव जोर करता है; तब काम शान्तिके लिये, ये लोग इधर-उधरसे व्यभिचारिणी दुष्टाओंको उड़ा लाकर घरमें रख लेते हैं। मनमें झमझते हैं, हम वैराग्यवान् हैं और इस अभिमानमें चूर भी रहते हैं। स्वयं जगतसे पुजना चाहते हैं; पर आप घरमें रक्खी हुई राँड़को पूजते हैं। ऐसोंका मानव-जन्म कृथा नष्ट होता है।
( ६ )
जो कामी या स्त्री-लोलुप होते हैं, उनका मन भगवान्में
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नहीं लग सकता ; पर जो सच्चे ईश्वर-भक्त होते हैं, वे विषय-भोग और स्त्रियोंका नाम तक नहीं लेते। विषयी पुरुषोंसे हरि-भक्ति नहीं हो सकती और हरि-भक्तों से स्त्री नहीं भोगी जा सकती। जिस तरह सूरज और रात अथवा दिन और रात एकत्र नहीं हो सकते ; उसी तरह राम और काम दोनों एकत्र नहीं हो सकते। मतलब यह है, जिन्हें ईश्वरके दर्शन करने हों, जिन्हें परमपद या सिद्धि प्राप्त करनी हो, वे स्त्रियोंके दर्शन, उनकी चर्चा और उनके चित्रों तक से बचें ; क्योंकि ईश्वर-प्राप्तिमें स्त्री एक खाईके समान है।
( ७ )
जब योगीके मनमें आशा नहीं रहती, उसे किसीसे कुछ चाहना नहीं रहती, तब योगी जगत्का गुरु होता है ; लेकिन जब योगीके मनमें आशा-तृष्णाका उदय होता है, जब योगी किसीसे कुछ चाहता है, तब योगी चेला हो जाता है और जगत् उसका गुरु हो जाता है ; यानी जगत् उसकी निन्दा करता और उसे नसीहत देता है। मतलब यह, सच्चे योगियों को किसी भी पदार्थकी चाहना नहीं होती ; अतः वे जगत्को इतनेके के सम्मान तुच्छ समझते हैं ; पर वासना या इच्छा रखनेवाले जगत् की खुशामद करते और इस तरह संसारी आदमियोंसे छोटे बनते हैं।
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कोरा सन्यासी-भेष धारना, नरकके सामान करना है ।
आजकल अनेक वेद-विरुद्ध काम करनेवाले, मनगढ़न्त मत चलानेवाले, झूठ बोलनेवाले, बगुला और बिलाव की सी वृत्ति रखनेवाले फिरते हैं । ग्रहस्थोंको चाहिये कि, उनका बातोंसे भी सत्कार न करें । ठगोंका सत्कार होनेसे ही ठग-साधु बढ़ रहे हैं । उनमेंसे कोई मूर्ति बनाकर पूजता और पुज-वाता है । कोई अपनेको कबीरपन्थी, कोई तानकपन्थी, कोई रामानुजी और कोई दादूपन्थी कहता है । इन पन्थोंसे कोई लाभ नहीं । जब तक 'आत्मज्ञान' नहीं होता, तब तक सिद्धि या मोक्ष नहीं मिलती ; अतः मनको, सब तरफसे हटाकर, आत्मचिन्तनमें लगाना चाहिये । ढोंग करनेसे मनुष्य-जन्म वृथा जाता है । काम तो सब यतियों के से किये जाते हैं, कष्ट भी उन्हींकी तरह उठाये जाते हैं ; पर परिणाममें मिलता कुछ भी नहीं । बिना आत्मज्ञान या ब्रह्मविचार के कल्याण नहीं होता । ग्रहस्थोंको भी चाहिए कि, ऐसे ठगोंका आदर-सम्मान न करें । ऐसे बनावटी साधु-संन्यासी आप नरकमें जाते और अपने शिष्योंको भी नरकमें घसीट ले जाते हैं ।
किसीने ठीक यही बात कबितामें बड़ी खूबीसे कही है :—
आत्मभेद बिन फ़िरें भटकते, सब धोखेकी टाटीमें ।
( ४२३ )
कोई धातुमें ईश्वर मानत, कोई पत्थर कोई माटीमें । वृक्ष कोई जलमें कोई, कोई जड़्याल कोई वाटीमें । कोई तुलसी खड़ाक्ष कोई, कोई मुद्रा कोई लाठीमें । भगत कबीर कोई कह नानक, कोई शंकर परिपाटीमें । कोई नीमार्क रामानुज है, कोई बह्रम परिपाटीमें । कोई दाढ़ू कोई गरीब दासी, कोई गेरु रंगकी हाटीमें । कहै “आजाद” सेष जो धारे, चले नरक की भाटीमें ॥
संन्यासी एक जगह न रहे ।
संन्यासीका मन किलीकी प्रीतिमें न फँस जाय अथवा किलीसे उसकी मुहब्बत न हो जाय ; इसलिये धर्मशास्त्रमें संन्यासियोंको एक दिनसे ज़ियादा एक गाँवमें रहना तक मना लिखा है। कहा है :—
( ४२४ )
आबे दरिया बहे तो बेहतर, इन्हीं रवा रहे तो बेहतर । पानी न बहे तो उसमें दुर्गन्ध आये । खजूर न चले तो मोर्चा खाये ॥
गिरिधर कवि कहते हैं :—
कुण्डलिया ।
( १ )
बहता पानी निर्मिला, पड़ा गन्ध सो होय । त्यों साधू रमता भला, दाग न लागे कोय ॥ दाग न लागे कोय, जगतसे रहे अलहदा । राग-द्वेष युग त्रेत, न चितको करें बिच्छेदा ॥ कह “गिरिधर” कविराय, शीत उष्णादिक सहता । होय न कहूँ आसक्त, यथा गंगा-जल बहता ॥
( २ )
रहनेो सदा इकतको, पुनि भजनेो भगवन्त । कथन श्रवण अद्वैतको, यही मतो है सन्त ॥ यही मतो है सन्त, तत्वको चितवन करनेो । प्रत्यक् ब्रह्म अभिन्न, सदा उर अन्तर धरनेो ॥ कह “गिरिधर” कविराय, ब्रह्मन दुर्जनको सहनेो । तजके जन-समुदाय, देश निर्जनमें रहनेो ॥
( ४२५ )
संन्यासियोके कर्तव्य कर्म ।
( यति पञ्चकसे )
वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो, भिक्षावमात्रेण च तुष्टिमन्तः । विशोकमन्तः करणे रमन्तः, कौपीनवतः खलु भाग्यवन्तः ॥
( २ )
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः, पारिण्डयं भोक्तुममन्त्रयन्तः । कल्यामिव श्रीमपि कुत्सयेतः, कौपीनवतः खलु भाग्यवतः ॥
( ३ )
देहादिभावं परिवर्चयन्तः, आत्मानमात्मन्यवलोकयन्तः । नान्तं न मध्यं न वहिः स्मरन्तः, कौपीनवतः खलु भाग्यवतः ॥
( ४ )
स्वानन्दभावे परितुष्टिमन्तः, सुशान्त सर्वेन्द्रियतुष्टिमन्तः ।
( ४२६ )
अहर्निश ब्रह्मसुखे रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥
( ५ )
पञ्चाक्षरं पावनमुच्चरन्तः; पतिं पशुनां हृदि भावयन्तः । भिद्वाशिनी दिक्षु परिभ्रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥
भावार्थ ।
( १ )
वेदान्त वाक्य या उपनिषद्मै अथवा ब्रह्मविद्यामें मन लगाये रहनेवाला, केवल शिक्षाके अन्तसे सन्तुष्ट रहने वाला, मनको शोक-ताप-शून्य करके सन्तुष्ट रहनेवाला और कौपीन पहनने वाला योगी भाग्यवान् है ।
( २ )
केवल वृक्षके मूलमें आश्रय लेनेवाला, दोनों हाथोंको भोजनके लिये न लगानेवाला, आत्मशुद्धाचा की तरह लक्ष्मी की निन्दा करनेवाला अर्थात् अपनी तारीफ और धनसे दूर रहने वाला, एवं कौपीन धारण करनेवाला योगी सुखी है ।
( ३ )
सुखासक्ति—वासनाको त्यागनेवाला, अपने स्वरूपमें