भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कोरा सन्यासी-भेष धारना, नरकके सामान करना है ।

आजकल अनेक वेद-विरुद्ध काम करनेवाले, मनगढ़न्त मत चलानेवाले, झूठ बोलनेवाले, बगुला और बिलाव की सी वृत्ति रखनेवाले फिरते हैं । ग्रहस्थोंको चाहिये कि, उनका बातोंसे भी सत्कार न करें । ठगोंका सत्कार होनेसे ही ठग-साधु बढ़ रहे हैं । उनमेंसे कोई मूर्ति बनाकर पूजता और पुज-वाता है । कोई अपनेको कबीरपन्थी, कोई तानकपन्थी, कोई रामानुजी और कोई दादूपन्थी कहता है । इन पन्थोंसे कोई लाभ नहीं । जब तक 'आत्मज्ञान' नहीं होता, तब तक सिद्धि या मोक्ष नहीं मिलती ; अतः मनको, सब तरफसे हटाकर, आत्मचिन्तनमें लगाना चाहिये । ढोंग करनेसे मनुष्य-जन्म वृथा जाता है । काम तो सब यतियों के से किये जाते हैं, कष्ट भी उन्हींकी तरह उठाये जाते हैं ; पर परिणाममें मिलता कुछ भी नहीं । बिना आत्मज्ञान या ब्रह्मविचार के कल्याण नहीं होता । ग्रहस्थोंको भी चाहिए कि, ऐसे ठगोंका आदर-सम्मान न करें । ऐसे बनावटी साधु-संन्यासी आप नरकमें जाते और अपने शिष्योंको भी नरकमें घसीट ले जाते हैं ।

किसीने ठीक यही बात कबितामें बड़ी खूबीसे कही है :—

आत्मभेद बिन फ़िरें भटकते, सब धोखेकी टाटीमें ।