भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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कोई धातुमें ईश्वर मानत, कोई पत्थर कोई माटीमें । वृक्ष कोई जलमें कोई, कोई जड़्याल कोई वाटीमें । कोई तुलसी खड़ाक्ष कोई, कोई मुद्रा कोई लाठीमें । भगत कबीर कोई कह नानक, कोई शंकर परिपाटीमें । कोई नीमार्क रामानुज है, कोई बह्रम परिपाटीमें । कोई दाढ़ू कोई गरीब दासी, कोई गेरु रंगकी हाटीमें । कहै “आजाद” सेष जो धारे, चले नरक की भाटीमें ॥

संन्यासी एक जगह न रहे ।

संन्यासीका मन किलीकी प्रीतिमें न फँस जाय अथवा किलीसे उसकी मुहब्बत न हो जाय ; इसलिये धर्मशास्त्रमें संन्यासियोंको एक दिनसे ज़ियादा एक गाँवमें रहना तक मना लिखा है। कहा है :—

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