भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४२१ )

नहीं लग सकता ; पर जो सच्चे ईश्वर-भक्त होते हैं, वे विषय-भोग और स्त्रियोंका नाम तक नहीं लेते। विषयी पुरुषोंसे हरि-भक्ति नहीं हो सकती और हरि-भक्तों से स्त्री नहीं भोगी जा सकती। जिस तरह सूरज और रात अथवा दिन और रात एकत्र नहीं हो सकते ; उसी तरह राम और काम दोनों एकत्र नहीं हो सकते। मतलब यह है, जिन्हें ईश्वरके दर्शन करने हों, जिन्हें परमपद या सिद्धि प्राप्त करनी हो, वे स्त्रियोंके दर्शन, उनकी चर्चा और उनके चित्रों तक से बचें ; क्योंकि ईश्वर-प्राप्तिमें स्त्री एक खाईके समान है।

( ७ )

जब योगीके मनमें आशा नहीं रहती, उसे किसीसे कुछ चाहना नहीं रहती, तब योगी जगत्का गुरु होता है ; लेकिन जब योगीके मनमें आशा-तृष्णाका उदय होता है, जब योगी किसीसे कुछ चाहता है, तब योगी चेला हो जाता है और जगत् उसका गुरु हो जाता है ; यानी जगत् उसकी निन्दा करता और उसे नसीहत देता है। मतलब यह, सच्चे योगियों को किसी भी पदार्थकी चाहना नहीं होती ; अतः वे जगत्को इतनेके के सम्मान तुच्छ समझते हैं ; पर वासना या इच्छा रखनेवाले जगत् की खुशामद करते और इस तरह संसारी आदमियोंसे छोटे बनते हैं।