वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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सेवा ही करते हैं। उन्हें सिर मुड़ाने, गेहूण कपड़े पहनने और घर त्यागने से कोई लाभ नहीं।
( ५ )
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो घर-गृहस्थीमें रहते हैं और शरीरसे अपने कुलके व्यवहार करते हैं; पर मनको सब ओरसे खींचकर, ममताको त्याग कर, उसे परमात्मामें लगाने हैं। प्रह्लाद और अम्बरीष प्रभृति ऐसे ही भक्त हो गये हैं। कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो तन और मन दोनोंसे ही ईश्वरकी भक्ति और उपासना करते हैं। नारद और शुक्रदेवकी गणना ऐसों में ही है। इन्होंने घर त्यागकर हरिभक्ति की। कुछ ऐसे लोग होते हैं कि, जो लोगोंको विभाने और हलवा-पूरी तथा खीर-खाँड़ उड़ानेके लिए, वेदान्त और पुराणोंको सीख लेते हैं और तोतेकी तरह मोठी-मोठी बातें बनावते हैं। सीधे-सादे भौद्ध लोग उनकी बातों पर रीक्ष कर, उन्हें रबड़ी-मलाई और मोहन-भोग खिलाते हैं। इन भालों के खानेसे जब कामदेव जोर करता है; तब काम शान्तिके लिये, ये लोग इधर-उधरसे व्यभिचारिणी दुष्टाओंको उड़ा लाकर घरमें रख लेते हैं। मनमें झमझते हैं, हम वैराग्यवान् हैं और इस अभिमानमें चूर भी रहते हैं। स्वयं जगतसे पुजना चाहते हैं; पर आप घरमें रक्खी हुई राँड़को पूजते हैं। ऐसोंका मानव-जन्म कृथा नष्ट होता है।
( ६ )
जो कामी या स्त्री-लोलुप होते हैं, उनका मन भगवान्में