वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वह वैरागी तो बन जाता है, भेष तो संन्यासियों का सा घर लेता है ; पर उसका मन विषयोंमें लगा रहता है ; इसलिये वह धोबीके कुत्तेकी तरह घर और घाद कहीं का नहीं रहता ; लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो घरमें ही रहते हैं ; पर सत्संग करते और हरि-यश सुनते हैं। वे सत्सङ्ग के प्रभाव और गुरुकी व्यासे, विषयोंसे मनको हटाकर, ईश्वरके गुणगान करने लगते हैं। फिर ; धीरे-धीरे उनकी भक्ति ईश्वरमें बढ़ जाती है और वे सच्चे भक्त हो जाते हैं। अनेक लोग घरमें ही रहकर इस तरह सिद्धि लाभ कर चुके हैं। सारंगि यद, विषयोंसे मन खींच लेनेवाला, ममता और वाहना न रखने वाला गृहस्थ भला ; पर विषयोंमें मन रखनेवाला, ममता और वासनाको न त्यागने वाला त्यागी संन्यासी भला नहीं।
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जिनका भगवान्के चरण-कमलोंमें सच्चा प्रेम नहीं है, जिनका हरिभक्तिके साधन—सन्तोंके वरणोंमें नेह नहीं है, जो महात्माओंकी सङ्कृति और पदचन्द्रना नहीं करते, वे वृथा ही घर छोड़, सिर मुँडा, भेष बदल कर भाँड़ हो गये हैं।
भाँड़ जिस तरह लोगोंको रिझाने और रुपया कमानेके लिये अनेक प्रकारके खाङ्ग धरते हैं ; उसी तरह आज-कल बहुतसे लोग रुपया कमाने और अपने तर्ज पुजवानेको संन्यासियोंका सा भेष बनाते हैं। • ये न तो भगवान्को जानते हैं और न उसके जाननेके लिये महात्माओंकी सङ्कृति और उनकी