वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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सकती है। मतलब यह कि, मनके योगी होनेसे सिद्धि मिलती है; कपड़े रँगने, माथा मुँडाने और डण्ड-कमण्डल प्रभृति रखनेसे सिद्धि नहीं मिलती।
( २ )
जिसके विशुद्ध हरि-भक्तिपूर्ण हृदयमें काम, लोभ और मोह प्रभृतिकी वासना पैदा हो जाती है, वह अपनी वासना पूरी करनेके लिये, नाना प्रकारके नोच कर्म करता है; फिर उसकी जो कृतीती और बदनामी होती है, उसका यथार्थ रूपमें वर्णन करना कठिन है। मतलब यह है कि, जिसके हृदय में केवल एक भगवान्को वासना होती है, उसका हृदय श्रेष्ठ और विशुद्ध समझा जाता है। यदि उसके हृदयमें इसके सिवा—भगवान्के अतिरिक्त और वासना उत्पन्न हो उठती है, उसका दिल धन-दौलत, स्त्री और राजपाट प्रभृतिपर चलायमान हो जाता है; तो उसकी संसारमें बड़ी बदनामी होती है। सारांश यह कि, यदि कोई संन्यासी, यति या हरिभक्त विषयोंको त्याग कर फिर विषयोंके जालमें फँसता है, राँड रखता है, इत्र फुलेल लगाता है, मलमल-खासा पहनता है और गद्दे तकियोंपर आराम करता है; तो उसकी वर्णनातीत अपकीर्ति होती है।
( ३ )
अगर कोई शस्त्र घर छोड़ कर और संन्यासी का भेष बना कर बन-बन फिरता है; पर उसका मन भगवान्में नहीं लगता, तो उसके घर छोड़ने और तकलीफ उठानेसे कोई लाभ नहीं।