वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४१७ )
काह भयो बन बन फिरे, जो बनि आगो नाहिं । बनते बनते बनि गयो, तुलसी घर ही माहिं ॥३॥ रामचरण परचे नहीं, बिन साधन पद-नेह । मुँड़ मुड़ायो बादिही, भाँड़ भये तजि गेह ॥४॥ कीर सरस वाणी पढ़त, चाखत चाहन खोंड़ । मन राखत वैराग महँ, घरमें राखत राँड़ ॥५॥ जहाँ काम तहँ राम नहीं, जहाँ राम नहीं काम । तुलसी दोनों नहीं मिलें, रवि रजनी इक ठाम ॥६॥ तब लगि योगी जगत्-गुरु, जब लगि रहै निरास । जब आशा मनमें जगी, जग गुरु योगी दास ॥७॥
( १ )
शरीरको योगी बहुत लोग करते हैं ; पर मनको कोई विरला ही योगी करता है ; अगर मन योगी हो जाता है ; तो सहजमें सिद्धि या मोक्ष मिल जाती है । दूसरे शब्दोंमें यों समझिये कि, लोग शेष तो संन्यासी-महात्माओंकासा कर लेते हैं ; पर मन उनका विषय-भोगोंमें लगा रहता है ; इसलिये उनको कुछ भी लाभ नहीं होता,—सिद्धि नहीं मिलती । अगर वे लोग शरीरको चाहे गृहस्थोंकासा रखें, उत्तमसे उत्तम खाने खाद्य, बढ़ियासे बढ़िया कपड़े पहने ; पर मनमें स्त्री-पुत्र, धन-दौलत, गाड़ी-घोड़े, नाच-रङ्ग आदिकी वासना और ममता न रखें ; तो उन्हें निश्चय ही सिद्धि मिल
२७