भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४१६ )

यस्तु प्रवजितो भूत्वा पुनः सेवेतु मैथुनम् ।

षष्ठिवर्षसहस्राणि विष्णुयां जायते क्रुमिः ॥

यतिको स्त्रीसे बात न करनी चाहिये, पहलेकी देखी हुई स्त्रीकी याद न करना चाहिये तथा स्त्रियोंकी चर्चा भी न करनी चाहिये और स्त्रीका चित्र भी न देखना चाहिये ।

जो संन्यासी होकर स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ६० हजार वर्ष तक विष्णुका कीड़ा होता है ।

और विषयोंसे मनको रोकना उतना कठिन नहीं, जितना कि स्त्रीसे रोकना कठिन है ; इसीसे स्त्रीका चित्र तक देखनेकी मनाही की है । जो ढोंगी साधु-सन्यासी दुनियादारोंके घर आते और स्त्रियोंमें बैठे रहते हैं, उनको उपदेश ग्रहण करना चाहिये ।

ढोंगी साधुओंके लिये अमूल्य उपदेश ।

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बनावटी या ढोंगी साधुओंके सम्बन्धमें महात्मा तुलसी- दासजीने कहा है :—

तनको योगी सब करें, मनको विरला कोय ।

सहजे सब सिधि पाइये, जो मन योगी होय ॥१॥

जाके उर बर वासन्य, भई भास कछु आन ।

तुलसी ताहि बिड-बना, केहि बिधि कथहि प्रमान ॥२॥