वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 530, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४१६ )
यस्तु प्रवजितो भूत्वा पुनः सेवेतु मैथुनम् ।
षष्ठिवर्षसहस्राणि विष्णुयां जायते क्रुमिः ॥
यतिको स्त्रीसे बात न करनी चाहिये, पहलेकी देखी हुई स्त्रीकी याद न करना चाहिये तथा स्त्रियोंकी चर्चा भी न करनी चाहिये और स्त्रीका चित्र भी न देखना चाहिये ।
जो संन्यासी होकर स्त्रीके साथ मैथुन करता है, वह ६० हजार वर्ष तक विष्णुका कीड़ा होता है ।
और विषयोंसे मनको रोकना उतना कठिन नहीं, जितना कि स्त्रीसे रोकना कठिन है ; इसीसे स्त्रीका चित्र तक देखनेकी मनाही की है । जो ढोंगी साधु-सन्यासी दुनियादारोंके घर आते और स्त्रियोंमें बैठे रहते हैं, उनको उपदेश ग्रहण करना चाहिये ।
ढोंगी साधुओंके लिये अमूल्य उपदेश ।
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बनावटी या ढोंगी साधुओंके सम्बन्धमें महात्मा तुलसी- दासजीने कहा है :—
तनको योगी सब करें, मनको विरला कोय ।
सहजे सब सिधि पाइये, जो मन योगी होय ॥१॥
जाके उर बर वासन्य, भई भास कछु आन ।
तुलसी ताहि बिड-बना, केहि बिधि कथहि प्रमान ॥२॥