भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बालोंका मन कैसे स्वियोंपर न चलेगा ? ऐसा कौन है, जिसका मन स्वियोंने खण्डित नहीं किया ? कहा है—

कोऽर्थान् प्राप्य न गर्विता ?

विषमिषः कस्यापदो नागता : ?

क्षीमिः कस्य न खण्डितं सुवि मनः ?

को नाम राज्ञां प्रियः ?

कः कालस्य न गोबरान्तरगतः ?

कोऽर्थी गतो गौरव ?

को वा दुर्जन-वागुग्रा-निपतितः

क्षेमेण यातः पुमान् ?

किसको धन पाकर गर्व नहीं हुआ ? किस विषयी पर आफ़्त नहीं आई ? पृथ्वी पर किसका मन नारीने आकृष्ट नहीं किया ? कौन राजाओंका प्यारा हुआ ? कौन कालकी नजरसे बचा ? किस मँगतेका गौरव हुआ ? कौन सज्जन दुष्टोंके जालमें फँसकर कुशलसे रहा ?

संन्यासियोंको स्त्री-दर्शन भी मना है ।

धर्मशास्त्रमें लिखा है :—

सम्भाषयेत् क्षिप्रं तैव, पूर्वदृष्टं च न स्मरेत् । कथां च वजयेत्तासां, नो पर्येक्षिष्वितामपि ॥