भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४२६ )

अहर्निश ब्रह्मसुखे रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥

( ५ )

पञ्चाक्षरं पावनमुच्चरन्तः; पतिं पशुनां हृदि भावयन्तः । भिद्वाशिनी दिक्षु परिभ्रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥

भावार्थ ।

( १ )

वेदान्त वाक्य या उपनिषद्मै अथवा ब्रह्मविद्यामें मन लगाये रहनेवाला, केवल शिक्षाके अन्तसे सन्तुष्ट रहने वाला, मनको शोक-ताप-शून्य करके सन्तुष्ट रहनेवाला और कौपीन पहनने वाला योगी भाग्यवान् है ।

( २ )

केवल वृक्षके मूलमें आश्रय लेनेवाला, दोनों हाथोंको भोजनके लिये न लगानेवाला, आत्मशुद्धाचा की तरह लक्ष्मी की निन्दा करनेवाला अर्थात् अपनी तारीफ और धनसे दूर रहने वाला, एवं कौपीन धारण करनेवाला योगी सुखी है ।

( ३ )

सुखासक्ति—वासनाको त्यागनेवाला, अपने स्वरूपमें