वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४२६ )
अहर्निश ब्रह्मसुखे रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥
( ५ )
पञ्चाक्षरं पावनमुच्चरन्तः; पतिं पशुनां हृदि भावयन्तः । भिद्वाशिनी दिक्षु परिभ्रमन्तः; कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः ॥
भावार्थ ।
( १ )
वेदान्त वाक्य या उपनिषद्मै अथवा ब्रह्मविद्यामें मन लगाये रहनेवाला, केवल शिक्षाके अन्तसे सन्तुष्ट रहने वाला, मनको शोक-ताप-शून्य करके सन्तुष्ट रहनेवाला और कौपीन पहनने वाला योगी भाग्यवान् है ।
( २ )
केवल वृक्षके मूलमें आश्रय लेनेवाला, दोनों हाथोंको भोजनके लिये न लगानेवाला, आत्मशुद्धाचा की तरह लक्ष्मी की निन्दा करनेवाला अर्थात् अपनी तारीफ और धनसे दूर रहने वाला, एवं कौपीन धारण करनेवाला योगी सुखी है ।
( ३ )
सुखासक्ति—वासनाको त्यागनेवाला, अपने स्वरूपमें