भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४२७ )

औरोंको देखनेवाला, अन्त, मध्य और पुत्रकलत्रादिको न याद करनेवाला एवं कोपीन बाँधनेवाला यति भाग्यवान् है।

( ४ )

अपने आत्माके ही आनन्दमें मग्न रहनेवाला, आँख कान नाक जीभ प्रभृति इन्द्रियोंके विषय-सुखोंके त्यागनेसे सन्तुष्ट और आत्मसाक्षात्कारसे खुश रहनेवाला एवं दिन-रात ब्रह्मके दर्शनोंसे पैदा हुए आनन्दमें रहनेवाला तथा कोपीन पहनने वाला योगी सुखी है।

( ५ )

“शिवाय नमः” इस पाँच अक्षरके, आत्माको शुद्ध करने वाले, भवका उन्चारण करनेवाला, हृदयमें पशुपति शङ्करकी भावना करता हुआ, भिक्षात्र पर गुजारा करके, दिशाओंमें घूमनेवाला और कोपीन धारण करनेवाला योगी भाग्यवान् है।

यतिपञ्चकका फल ।

वास्तविक महापुरुष होनेकी इच्छा रखनेवालोंको उपरोक्त “यतिपञ्चक” कण्ठाग्र कर लेना और इस पर अमल करना चाहिये ; तब उन्हें निश्चय ही शान्ति और सिद्धि मिलेगी।

छप्पय ।

शतहि वर्षकी आयु, रातमें वीतत आये ।

ताके आये आय, वृद्ध बालकूपन साधे ॥

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