वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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रहे यहै दिन, आधि व्याधि ग्रहकाज समोये । नाना विधि बकवाद करत, सबहिनको खोये ॥ जलकी तरंग बुदबुद सदश, देह खेह हूये जात है । सुख कहो कहौं इन नरनकौं, जासों फूलत गात है ॥१०७॥
107. The average longevity of a man is estimated at hundred years. Half of it passes away in nights. Of the remainder one portion is spent in childhood and another in old age. What finally remains is led with hardship caused by disease and separation in other people's service etc. Where is the happiness for living beings in a life which is as restless as the currents of water ?
ब्रह्मज्ञानविचेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं
यन्मुच्यतेपुण्यभोगकांचननान्येकांततो निःस्पृहाः ॥
न प्रातानि पुरा न संपति न च प्राप्नो ददृमत्ययो
वाञ्छामात्रपरिग्रहाणयपि परं त्यक्तुं न शक्त वयम् ॥१०८॥
उन बुद्धिमान, निर्मल ज्ञानवाले, ब्रह्मज्ञानियोंका कठिन व्रत देखकर हमें बड़ा विस्मय होता है, जो विषय-भोग, धन-दौलत, सोना-चाँदी और स्त्री-पुत्र प्रभृति को एकदम से त्याग देते हैं और फिर उनकी इच्छा नहीं रखते ॥१०८॥
सत् और असत्का विचार करनेवाले, देह और आत्माको अलग-अलग समझनेवाले, इस संसारको खप्रवत माननेवाले,