भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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इस जगत्की झूठी चमक-दमक पर मोहित न होनेवाले पुरुष “ज्ञानी” कहलाते हैं। जिनके सामनेसे मायाका पर्दा हट जाता है, जिन्हें देहके नाशमान और आत्माके नित्य और अविनाशी होनेका ज्ञान हो जाता है, उन्हें परमात्मा दीखने लगता है। उन्हें परमात्मा के ध्यानमें जो आनन्द आता है, उसकी बराबरी त्रिभुवनके सारे सुखेश्वर्य भी नहीं कर सकते। ऐसे ज्ञानी इस जगत्से नाता क्यों जोड़ने लगे ? जब तक उन्हें ज्ञान नहीं होता ; मायाका पर्दा उनकी आँखोंके सामनेसे नहीं हटता, शरीर और आत्माका भेद मालूम नहीं होता, तभी तक वे इस संसारी जालमें फँसे रहते हैं ; जहाँ उन्हें ज्ञान हुआ, और उन्होंने संसारीकी असलियत समझी, तहाँ फौरन ही इसे छोड़ा। एकबार छोड़कर, फिर इसकी इच्छा वे इसलिये नहीं करते, कि वे समझ-बूझ कर इसे छोड़ते हैं ; जबर्दस्ती या किसीके बहकाने से अथवा दूकान्दारी के लिए तो वे इसे छोड़ते ही नहीं, जो उनकी लालसा इसमें बनी रहे।

जो लोग रुपया पैदा करने या पुजनेके लिए घर-गृहस्थी को छोड़ते हैं, उनका मन संसारके विषय-भोगोंमें लगा रहता है। वे न तो इधरके ही रहते हैं और न उधरके ही। वे “घुओबी का कुत्ता घरका न घाटका” अथवा “खुदाही मिल्ला न विसाले सनम” या “दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम” वाली कहावतोंको चरितार्थ करते हैं। ऐसे कच्चे त्यागियोंके सम्बन्ध में गोस्वामि तुलसीदास जी कहते हैं :—