वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४३० )
इत कुल की करनी तजे, उत न भजे भगवान । तुलसी अथवर के भये, ज्यों बघूर को पान ॥
अर्थात् इधर तो वे अपना घरबार और स्त्री-पुत्र तथा अपने कुलके कामोंको छोड़ बैठते हैं और उधर भगवान्को भी नहीं भजते । वे हवाके बण्डर या भभूलेमें चकर खानेवाले पत्तेकी तरह अथवरमें ही चकर खाते रहते हैं ।
अगर वे अपने घरमें ही रहते, तो अपने कुल-वर्णके अनुसार कर्म करते और महात्माओंकी संगति तथा उनकी सेवा-दहल से संसारकी असारता, अपने नातेदारोंको स्वार्थपरता एवं ईश्वरकी महिमाका ज्ञान लाभ करके, ईश्वरकी भक्ति करते हुए, प्रह्लाद, जनक और अम्बरीष प्रभृतिकी तरह, घरमें रहकर ही, सिद्धि लाभ करते । नादान लोग, बिना पूर्ण वैराग्य और ज्ञानके, धरगृहस्थीको छोड़कर वनमें चले तो जाते हैं ; पर उनकी वासना—ममता अपने घर वालों अथवा पराई स्त्रियों या धन-दौलतमें बनी ही रहती है ; इसलिये वे संसारियोंकी निन्दाके भयसे लुक-छिपकर विषयोंको भोगते और परमात्मामें मग्न नहीं लगाते । इस तरह उनके लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं—वे न तो संसारी सुख ही भोग सकते हैं और न स्वर्ग या मोक्ष ही लाभ कर सकते हैं । सारांश यह, मनुष्यको संसारसे पूरी विरक्ति होनेपर संन्यास लेना चाहिये और एकबार त्यागी बन कर फिर अत्यागी न बनना चाहिये । त्यागी होकर विषयों