भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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में ठालसा रखने वाले महा नीच हैं। उनकी श्रोंनों जहानमंघोर दुग्गति होती है।

प्रत्येक मनुष्यको समझना चाहिये कि, यह संसार वास्तव में ही माया-जाल है। यहाँ कोई किसीका नहीं है। सब अपना-अपना मतलब गाँठते हैं। मतलब नहीं, तो कोई किसीका नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं :—

तुलसी स्वारथके सगे, विन स्वारथ कोई नाहीं ।

सरस वृक्ष पंछी बसें, निरस भये उड़ जाहि ॥

सभी स्वार्थके सगे हैं; बिना स्वार्थ कोई किसीका नहीं है। जबतक वृक्षमें फल रहते हैं, तभी तक पंछी उस पर रहते हैं; जहाँ वृक्ष फलहीन हुआ, कि वे उसे छोड़कर और जगह उड़ जाते हैं। यही हाल संसारका है। सब बड़े दमका मेला है। सभी जीते जीके साथी हैं; मरतेही सारी मुहब्बत उड़ जाती है। जो स्त्री अर्द्धाङ्गी कहलाती है, जो पुरुषको अपना आणप्यारा कहती है, उसे गलेसे लगाती है और उसके लिये जान तक देनेको तैयार रहती है, दम निकलते ही उससे डरने या भय खाने लगती है। अगर वह रोती भी है, तो अपने सुखोंके लिए रोती है; उसके लिए नहीं रोती। और कुटुम्बी—माता-पिता बहिन भाई इत्यादि भी दम निकलते ही कहने लगते हैं,—“जबही उठाओ, अब घरमें रखना ठीक नहीं।”

इस मौकेकी एक कहानी हमें याद आई है। उसे हम पाठकोंके उपकारार्थ नीचे लिखते हैं :—