भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सब जीते जीके साथी हैं ।

एक सेठका लड़का किसी महात्माके पास जाया करता था। सेठको भय हुआ कि, कहीं पुत्र वैराग्य न ले ले; इसलिये उसने पुत्र-बन्धुसे कहला दिया कि, वह पुत्रको हर तरहसे अपने वशमें कर ले; जिससे महात्माकी संगति छूट जाय। लड़के की स्त्री उस दिनसे उसकी सेवा-दृढ़ और भी ज़ियादा करने लगी; हाथोंमें उसका मन रखने लगी। लड़का जब घरसे बाहर जाता, तभी वह कहती—“आपका बियोग मुझसे सहा नहीं जाता। क्षण-भरमें ही मेरे प्राण अकुलाने लगते हैं; अतः आप मुझे छोड़ कर कहीं न जाया करें। लड़केने महात्माके पास जाना कम ज़रूर कर दिया; पर कभी-कभी वह चला ही जाता था। एक दिन वह बहुत दिन बीचमें देकर पहुँचा। महात्माने कहा—“भाई, आज-कल तुम आवे क्यों नहीं?” उसने कहा—“मेरी स्त्री मुझे बहुत ही ग्यार करती है। उसे मेरे बिना क्षण-भर भी कल नहीं पड़ता; इसीसे आना नहीं होता।” महात्माने कहा—“भाई! ये सब कूटी बातें हैं। संसारमें कोई किसीको नहीं चाहता। अगर तुमको विश्वास न हो, तो परीक्षा कर लो।”

सेठके पुत्रने परीक्षा करना ही उचित समझा। महात्माने उसे प्राणायाम या साँस चढ़ानेकी क्रिया सिखा दी। जब वह प्राणायामकी क्रियामें पक्का हो गया, तब महात्माने कहा—