भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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“आज तू घर जाकर कहना कि, मेरे पेटमें बड़ा दर्द है। इसके बाद साँस चढ़ाकर पड़ जाना; पर पहले यह कह देना कि, यदि मेरी मृत्यु हो जाय, तो असुक महात्माको बुलाये बिना मुझे मत जलाना।” लड़का घर पहुँचा और पेटके दर्दके मारे चिलाने लगा। कुछ देर बाद ज़मीन पर गिर पड़ा और माता-पितासे कहने लगा—“यदि मैं मर जाऊँ, तो बिना असुक महात्माको बुलाये और दिखाये मुझे मत जलाना।” इसके बाद उसने साँस चढ़ा लिया। घरवालोंने उसे देखा तो बोले—“अब इसमें दम नहीं, काठी-कफन लाओ और श्मशानकी तैयारी करो।” इतनेमें उसकी माँ बोली,—“पुत्रने असुक महात्माको बुलानेको कहा था, इसलिये पहले उन्हें बुलवालो।” सेठने महात्माके पास आदमी भेजा। वह तत्काल चले आये। उन्हें देखते ही सेठ बोला—“मैं मर जाऊँ, तो हानि नहीं; पर मेरा पुत्र जी उठे, यही मेरी इच्छा है।” यही बात सेठानी और लड़केकी स्त्रीने भी कही। महात्माने कहा—“मैं एक पुड़िया देता हूँ। तुममें से जो कोई इसे खा लेगा, वह मर जायगा और लड़का जी उठेगा।” इस बातके सुनते ही, सब लगे बगले भाँकने और बहाना करने। तब महात्माने कहा—“बैर, तुम सब नहीं खाते, तो मैं ही खा लेगा हूँ।” यह कह, महात्माने पुड़िया खा ली और क्रिया धारा लड़केका साँस उतार, उसे होशमें कर दिया। लड़केने प्राण हाल सुना। सुनते ही उसे संसारी मुहब्बतका सच्चा, हार्दिक मालूम हो गया

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