भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 548

( ४३४ )

और उसने घर छोड़ वैराग्य ले लिया। देखिये ! कुटुम्बियोंकी प्रीतिका चित्र महत्तमा सुन्दरदासजी कैसी उम्दगीके साथ बॉचते हैं :—

( १ )

मात पिता युवती सुत बान्धव ।

लागत है सब कूँ अति प्यारो ॥

लोक कुटुम्ब खरो हित राखत ।

होइ नहीं हमतें कहैं न्यारो ॥

देह-सनेह तहाँ लग जानहु ।

बोलत है मुख शब्द उचारो ॥

“सुन्दर” चेतन-शक्ति गई जब ।

बेगि कहें घर बार निकारो ॥

( २ )

रूप भलो तबही लग दीसत ।

जौँ लग बोलत-चालत आगे ॥

पीवत खात सुनै और देखत ।

सोइ रहे उठिके पुनि जागै ॥

मात पिता भइया मिलि बैठत ।

प्यार करे युवती गल लागे ॥

“सुन्दर” चेतन-शक्ति गई जब ।

देखत ताहि सबै डर भागे ॥