वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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और उसने घर छोड़ वैराग्य ले लिया। देखिये ! कुटुम्बियोंकी प्रीतिका चित्र महत्तमा सुन्दरदासजी कैसी उम्दगीके साथ बॉचते हैं :—
( १ )
मात पिता युवती सुत बान्धव ।
लागत है सब कूँ अति प्यारो ॥
लोक कुटुम्ब खरो हित राखत ।
होइ नहीं हमतें कहैं न्यारो ॥
देह-सनेह तहाँ लग जानहु ।
बोलत है मुख शब्द उचारो ॥
“सुन्दर” चेतन-शक्ति गई जब ।
बेगि कहें घर बार निकारो ॥
( २ )
रूप भलो तबही लग दीसत ।
जौँ लग बोलत-चालत आगे ॥
पीवत खात सुनै और देखत ।
सोइ रहे उठिके पुनि जागै ॥
मात पिता भइया मिलि बैठत ।
प्यार करे युवती गल लागे ॥
“सुन्दर” चेतन-शक्ति गई जब ।
देखत ताहि सबै डर भागे ॥