भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 549, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 549

( ४३५ )

मा, बाप, स्त्री, पुत्र और नातेदार सबको पुरुष बहुतही प्यारा लगता है। सब लोग उससे पूरब मुहव्रत करते और चाहते हैं कि, यह हमसे अलग न हो। लेकिन यह देहकी मुहव्रत उसी समय तक है, जबतक कि प्राणी अच्छी तरह बोलता चालता है। “सुन्दरदासजी” कहते हैं,—जहाँ शरीरमेंसे चेतन-शक्ति—आत्मा निकल कर गई, कि वेही सब कहने लगते हैं—“इसे जल्दी घरसे बाहर निकालो।” जबतक प्राणी बोलता, चालता, खाता, पीता, सुनता और देखता है एवं सोकर फिर जाग उठता है; तभी तक मा-बाप और भाई पास बैठते हैं और गुनवती गलेसे लगकर प्यार करती है। “सुन्दर-दासजी” कहते हैं,—ज्योही चेतन-शक्ति शरीरसे निकल कर बाहर गई कि, लोग उसे देखते ही डर कर भागने लगते हैं।

जिस संसारकी ऐसी गति है, जो निरा भाया-जाल या गोरखधन्वा है, जिसमें कुछ भी सार-तत्त्व नहीं है, जिसमें स्वार्थपरता या खुदागरजी कूट-कूट कर भरी है, उसपर मूर्ख ही लट्टू होते हैं। जो दाना और समझदार हैं, वे उसके जालमें नहीं फँसते अगर फँस भी जाते हैं, तो सबको छोड़-छाड़कर अलग हो जाते हैं। जितने विद्वान और महात्मा हुए हैं, सभी ने कहा है—“इस संसारके साथ दिल मत लगाओ; इसके बनाने वालेके साथ दिल लगाओ। इसीमें आपकी भलाई और आपका कल्याण है। उसकी शरणमें जाने वालेके पास दुःख और क्लेश नहीं फुटकते। वह अपने शरणार्थीकी सदा रक्षा