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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ४२८ )

रहे यहै दिन, आधि व्याधि ग्रहकाज समोये । नाना विधि बकवाद करत, सबहिनको खोये ॥ जलकी तरंग बुदबुद सदश, देह खेह हूये जात है । सुख कहो कहौं इन नरनकौं, जासों फूलत गात है ॥१०७॥

107. The average longevity of a man is estimated at hundred years. Half of it passes away in nights. Of the remainder one portion is spent in childhood and another in old age. What finally remains is led with hardship caused by disease and separation in other people's service etc. Where is the happiness for living beings in a life which is as restless as the currents of water ?

ब्रह्मज्ञानविचेकिनोऽमलधियः कुर्वन्त्यहो दुष्करं

यन्मुच्यतेपुण्यभोगकांचननान्येकांततो निःस्पृहाः ॥

न प्रातानि पुरा न संपति न च प्राप्नो ददृमत्ययो

वाञ्छामात्रपरिग्रहाणयपि परं त्यक्तुं न शक्त वयम् ॥१०८॥

उन बुद्धिमान, निर्मल ज्ञानवाले, ब्रह्मज्ञानियोंका कठिन व्रत देखकर हमें बड़ा विस्मय होता है, जो विषय-भोग, धन-दौलत, सोना-चाँदी और स्त्री-पुत्र प्रभृति को एकदम से त्याग देते हैं और फिर उनकी इच्छा नहीं रखते ॥१०८॥

सत् और असत्का विचार करनेवाले, देह और आत्माको अलग-अलग समझनेवाले, इस संसारको खप्रवत माननेवाले,

( ४२६ )

इस जगत्की झूठी चमक-दमक पर मोहित न होनेवाले पुरुष “ज्ञानी” कहलाते हैं। जिनके सामनेसे मायाका पर्दा हट जाता है, जिन्हें देहके नाशमान और आत्माके नित्य और अविनाशी होनेका ज्ञान हो जाता है, उन्हें परमात्मा दीखने लगता है। उन्हें परमात्मा के ध्यानमें जो आनन्द आता है, उसकी बराबरी त्रिभुवनके सारे सुखेश्वर्य भी नहीं कर सकते। ऐसे ज्ञानी इस जगत्से नाता क्यों जोड़ने लगे ? जब तक उन्हें ज्ञान नहीं होता ; मायाका पर्दा उनकी आँखोंके सामनेसे नहीं हटता, शरीर और आत्माका भेद मालूम नहीं होता, तभी तक वे इस संसारी जालमें फँसे रहते हैं ; जहाँ उन्हें ज्ञान हुआ, और उन्होंने संसारीकी असलियत समझी, तहाँ फौरन ही इसे छोड़ा। एकबार छोड़कर, फिर इसकी इच्छा वे इसलिये नहीं करते, कि वे समझ-बूझ कर इसे छोड़ते हैं ; जबर्दस्ती या किसीके बहकाने से अथवा दूकान्दारी के लिए तो वे इसे छोड़ते ही नहीं, जो उनकी लालसा इसमें बनी रहे।

जो लोग रुपया पैदा करने या पुजनेके लिए घर-गृहस्थी को छोड़ते हैं, उनका मन संसारके विषय-भोगोंमें लगा रहता है। वे न तो इधरके ही रहते हैं और न उधरके ही। वे “घुओबी का कुत्ता घरका न घाटका” अथवा “खुदाही मिल्ला न विसाले सनम” या “दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम” वाली कहावतोंको चरितार्थ करते हैं। ऐसे कच्चे त्यागियोंके सम्बन्ध में गोस्वामि तुलसीदास जी कहते हैं :—

( ४३० )

इत कुल की करनी तजे, उत न भजे भगवान । तुलसी अथवर के भये, ज्यों बघूर को पान ॥

अर्थात् इधर तो वे अपना घरबार और स्त्री-पुत्र तथा अपने कुलके कामोंको छोड़ बैठते हैं और उधर भगवान्को भी नहीं भजते । वे हवाके बण्डर या भभूलेमें चकर खानेवाले पत्तेकी तरह अथवरमें ही चकर खाते रहते हैं ।

अगर वे अपने घरमें ही रहते, तो अपने कुल-वर्णके अनुसार कर्म करते और महात्माओंकी संगति तथा उनकी सेवा-दहल से संसारकी असारता, अपने नातेदारोंको स्वार्थपरता एवं ईश्वरकी महिमाका ज्ञान लाभ करके, ईश्वरकी भक्ति करते हुए, प्रह्लाद, जनक और अम्बरीष प्रभृतिकी तरह, घरमें रहकर ही, सिद्धि लाभ करते । नादान लोग, बिना पूर्ण वैराग्य और ज्ञानके, धरगृहस्थीको छोड़कर वनमें चले तो जाते हैं ; पर उनकी वासना—ममता अपने घर वालों अथवा पराई स्त्रियों या धन-दौलतमें बनी ही रहती है ; इसलिये वे संसारियोंकी निन्दाके भयसे लुक-छिपकर विषयोंको भोगते और परमात्मामें मग्न नहीं लगाते । इस तरह उनके लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं—वे न तो संसारी सुख ही भोग सकते हैं और न स्वर्ग या मोक्ष ही लाभ कर सकते हैं । सारांश यह, मनुष्यको संसारसे पूरी विरक्ति होनेपर संन्यास लेना चाहिये और एकबार त्यागी बन कर फिर अत्यागी न बनना चाहिये । त्यागी होकर विषयों

( ४३१ )

में ठालसा रखने वाले महा नीच हैं। उनकी श्रोंनों जहानमंघोर दुग्गति होती है।

प्रत्येक मनुष्यको समझना चाहिये कि, यह संसार वास्तव में ही माया-जाल है। यहाँ कोई किसीका नहीं है। सब अपना-अपना मतलब गाँठते हैं। मतलब नहीं, तो कोई किसीका नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं :—

तुलसी स्वारथके सगे, विन स्वारथ कोई नाहीं ।

सरस वृक्ष पंछी बसें, निरस भये उड़ जाहि ॥

सभी स्वार्थके सगे हैं; बिना स्वार्थ कोई किसीका नहीं है। जबतक वृक्षमें फल रहते हैं, तभी तक पंछी उस पर रहते हैं; जहाँ वृक्ष फलहीन हुआ, कि वे उसे छोड़कर और जगह उड़ जाते हैं। यही हाल संसारका है। सब बड़े दमका मेला है। सभी जीते जीके साथी हैं; मरतेही सारी मुहब्बत उड़ जाती है। जो स्त्री अर्द्धाङ्गी कहलाती है, जो पुरुषको अपना आणप्यारा कहती है, उसे गलेसे लगाती है और उसके लिये जान तक देनेको तैयार रहती है, दम निकलते ही उससे डरने या भय खाने लगती है। अगर वह रोती भी है, तो अपने सुखोंके लिए रोती है; उसके लिए नहीं रोती। और कुटुम्बी—माता-पिता बहिन भाई इत्यादि भी दम निकलते ही कहने लगते हैं,—“जबही उठाओ, अब घरमें रखना ठीक नहीं।”

इस मौकेकी एक कहानी हमें याद आई है। उसे हम पाठकोंके उपकारार्थ नीचे लिखते हैं :—

( ४३२ )

सब जीते जीके साथी हैं ।

एक सेठका लड़का किसी महात्माके पास जाया करता था। सेठको भय हुआ कि, कहीं पुत्र वैराग्य न ले ले; इसलिये उसने पुत्र-बन्धुसे कहला दिया कि, वह पुत्रको हर तरहसे अपने वशमें कर ले; जिससे महात्माकी संगति छूट जाय। लड़के की स्त्री उस दिनसे उसकी सेवा-दृढ़ और भी ज़ियादा करने लगी; हाथोंमें उसका मन रखने लगी। लड़का जब घरसे बाहर जाता, तभी वह कहती—“आपका बियोग मुझसे सहा नहीं जाता। क्षण-भरमें ही मेरे प्राण अकुलाने लगते हैं; अतः आप मुझे छोड़ कर कहीं न जाया करें। लड़केने महात्माके पास जाना कम ज़रूर कर दिया; पर कभी-कभी वह चला ही जाता था। एक दिन वह बहुत दिन बीचमें देकर पहुँचा। महात्माने कहा—“भाई, आज-कल तुम आवे क्यों नहीं?” उसने कहा—“मेरी स्त्री मुझे बहुत ही ग्यार करती है। उसे मेरे बिना क्षण-भर भी कल नहीं पड़ता; इसीसे आना नहीं होता।” महात्माने कहा—“भाई! ये सब कूटी बातें हैं। संसारमें कोई किसीको नहीं चाहता। अगर तुमको विश्वास न हो, तो परीक्षा कर लो।”

सेठके पुत्रने परीक्षा करना ही उचित समझा। महात्माने उसे प्राणायाम या साँस चढ़ानेकी क्रिया सिखा दी। जब वह प्राणायामकी क्रियामें पक्का हो गया, तब महात्माने कहा—

( ४३३ )

“आज तू घर जाकर कहना कि, मेरे पेटमें बड़ा दर्द है। इसके बाद साँस चढ़ाकर पड़ जाना; पर पहले यह कह देना कि, यदि मेरी मृत्यु हो जाय, तो असुक महात्माको बुलाये बिना मुझे मत जलाना।” लड़का घर पहुँचा और पेटके दर्दके मारे चिलाने लगा। कुछ देर बाद ज़मीन पर गिर पड़ा और माता-पितासे कहने लगा—“यदि मैं मर जाऊँ, तो बिना असुक महात्माको बुलाये और दिखाये मुझे मत जलाना।” इसके बाद उसने साँस चढ़ा लिया। घरवालोंने उसे देखा तो बोले—“अब इसमें दम नहीं, काठी-कफन लाओ और श्मशानकी तैयारी करो।” इतनेमें उसकी माँ बोली,—“पुत्रने असुक महात्माको बुलानेको कहा था, इसलिये पहले उन्हें बुलवालो।” सेठने महात्माके पास आदमी भेजा। वह तत्काल चले आये। उन्हें देखते ही सेठ बोला—“मैं मर जाऊँ, तो हानि नहीं; पर मेरा पुत्र जी उठे, यही मेरी इच्छा है।” यही बात सेठानी और लड़केकी स्त्रीने भी कही। महात्माने कहा—“मैं एक पुड़िया देता हूँ। तुममें से जो कोई इसे खा लेगा, वह मर जायगा और लड़का जी उठेगा।” इस बातके सुनते ही, सब लगे बगले भाँकने और बहाना करने। तब महात्माने कहा—“बैर, तुम सब नहीं खाते, तो मैं ही खा लेगा हूँ।” यह कह, महात्माने पुड़िया खा ली और क्रिया धारा लड़केका साँस उतार, उसे होशमें कर दिया। लड़केने प्राण हाल सुना। सुनते ही उसे संसारी मुहब्बतका सच्चा, हार्दिक मालूम हो गया

२८

( ४३४ )

और उसने घर छोड़ वैराग्य ले लिया। देखिये ! कुटुम्बियोंकी प्रीतिका चित्र महत्तमा सुन्दरदासजी कैसी उम्दगीके साथ बॉचते हैं :—

( १ )

मात पिता युवती सुत बान्धव ।

लागत है सब कूँ अति प्यारो ॥

लोक कुटुम्ब खरो हित राखत ।

होइ नहीं हमतें कहैं न्यारो ॥

देह-सनेह तहाँ लग जानहु ।

बोलत है मुख शब्द उचारो ॥

“सुन्दर” चेतन-शक्ति गई जब ।

बेगि कहें घर बार निकारो ॥

( २ )

रूप भलो तबही लग दीसत ।

जौँ लग बोलत-चालत आगे ॥

पीवत खात सुनै और देखत ।

सोइ रहे उठिके पुनि जागै ॥

मात पिता भइया मिलि बैठत ।

प्यार करे युवती गल लागे ॥

“सुन्दर” चेतन-शक्ति गई जब ।

देखत ताहि सबै डर भागे ॥

( ४३५ )

मा, बाप, स्त्री, पुत्र और नातेदार सबको पुरुष बहुतही प्यारा लगता है। सब लोग उससे पूरब मुहव्रत करते और चाहते हैं कि, यह हमसे अलग न हो। लेकिन यह देहकी मुहव्रत उसी समय तक है, जबतक कि प्राणी अच्छी तरह बोलता चालता है। “सुन्दरदासजी” कहते हैं,—जहाँ शरीरमेंसे चेतन-शक्ति—आत्मा निकल कर गई, कि वेही सब कहने लगते हैं—“इसे जल्दी घरसे बाहर निकालो।” जबतक प्राणी बोलता, चालता, खाता, पीता, सुनता और देखता है एवं सोकर फिर जाग उठता है; तभी तक मा-बाप और भाई पास बैठते हैं और गुनवती गलेसे लगकर प्यार करती है। “सुन्दर-दासजी” कहते हैं,—ज्योही चेतन-शक्ति शरीरसे निकल कर बाहर गई कि, लोग उसे देखते ही डर कर भागने लगते हैं।

जिस संसारकी ऐसी गति है, जो निरा भाया-जाल या गोरखधन्वा है, जिसमें कुछ भी सार-तत्त्व नहीं है, जिसमें स्वार्थपरता या खुदागरजी कूट-कूट कर भरी है, उसपर मूर्ख ही लट्टू होते हैं। जो दाना और समझदार हैं, वे उसके जालमें नहीं फँसते अगर फँस भी जाते हैं, तो सबको छोड़-छाड़कर अलग हो जाते हैं। जितने विद्वान और महात्मा हुए हैं, सभी ने कहा है—“इस संसारके साथ दिल मत लगाओ; इसके बनाने वालेके साथ दिल लगाओ। इसीमें आपकी भलाई और आपका कल्याण है। उसकी शरणमें जाने वालेके पास दुःख और क्लेश नहीं फुटकते। वह अपने शरणार्थीकी सदा रक्षा

( ४३६ )

करता है । कौरव-सभामें उसीने द्रौपदी की लाज रक्खी थी । जो उसे याद करता है, उसकी खबर वह अवश्य लेता है । कहा है :—

जो तुमको सुमिरत जगदीशा, ताहि आपनो जानत ईशा । अभिमानी से हो तुम दूरा, सतवादीके जीवनमूरा । सुखी मीन जहँ नीर अगाधा, जिमि हरशरण न एको बाधा ॥

॥ दोहा ॥

बड़े विवेकी तजत हैं, सम्भति सुतपितु मात ।

कन्या और कोपीन हूँ, हमसे तजो न जात ॥ १०८ ॥

108. How wonderful is the action of those wise in the knowledge of Brahma and pure of reason, who renounce altogether, without any further desire to regain them the pleasures of life, gold and all other objects of wealth ! We neither possessed such things before, nor do we possess them now, nor is there any certainty of getting them hereafter, still we are unable to give up even the desire for obtaining them.

व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जन्यन्ती

रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम् ॥

आयुः परिस्रवति भिन्नवटादिवाभ्यो

लोकस्तथाप्यहितभाचरतीति चित्रम् ॥ १०६ ॥

वृद्धावस्था भयङ्कर वाक्कीकी तरह सामने खड़ी है । रोग शत्रुओंकी तरह आक्रमण कर रहे हैं, आयु फूटे हुए घड़ेके पानी

( ४३७ )

की तरह निकली चली जा रही है। आश्चर्य्यकी बात है, फिर भी लोग वही काम करते हैं, जिससे उनका अन्तिष्ठ हो ! ॥१०६॥

बुढ़ापा मौत का पेशखीमा है ।

बुढ़ापा मौतका पेशखीमा या बकौल "सिसरो" जिन्दगीके डामा या नाटकका आखिरी सीन है। इसीसे चतुर पुरुष बुढ़ापे को देखते ही समझ लेते हैं कि, मौत अब आने ही वाली है—हमारे जीवन-नाटकका अन्तिम पर्दा गिरने ही वाला है—हमारी जिन्दगीका अभिनय अब ख़तम होने ही वाला है। इसीसे अगर उन्होंने जवानी और बचपनके दिन बुथाके जज़ालों में भी खोये हैं; तो बुढ़ापेमें वे चेत जाते हैं और सब तजकर हर भजने लगते हैं; पर ऐसे समझदारोंकी संख्या बहुत थोड़ी है। ज़ियादा तादाद उन अज्ञानियोंकी है, जो बुढ़ापेको सामने देखकर भी, दम और खाँसीके आक्रमण होनेपर भी, घर-वालोंसे तिरस्कृत होनेपर भी, संसारकी ममता नहीं छोड़ते। अनेक बूढ़े ठीक चला-चलीके समय शादी-विवाह करते हैं; अनेक बेटे पोतोंकी पालनामें लगे रहते हैं और अनेक धन बढ़ानेकी चिन्तामें ही मशगूल रहते हैं। इन सब कामोंसे मनुष्योंका अन्तिष्ठ साधन होता है। न तो उन्हें इस जन्ममें ही क्षण-भरको शान्ति मिलता है और न मरने पर अगले जन्ममें ही। ममता और कामनाके कारण उनका संसार-बन्धन दृढ़ होता जाता है और वे बारबार मरते और जन्म लेते हैं तथा

( ४३८ )

इस घोर दुःखको सुख समझते हैं। भगवान् जाने उन्हें इन घोर दुःखोंको देखकर भी कैसे सन्तोष होता है? भगवान् शङ्कराचार्य कहते हैं:—

यावज्जननं तावन्मरणं, तावज्जननी जठरे शयनम् ।

इति संसारे स्फुटतर दोषः, कथमिह मानव! तव सन्तोषः? ।।

जब तक जन्म ग्रहण करना है, तब तक मरना और माता के पेटमें सोना है। संसारमें यह दोष स्पष्ट है। हे मनुष्य! फिर भी तुझे इस जगत्से कैसे सन्तोष है?

रोज़ आँखोंसे देखते हैं, कि इस संसारमें जरा भी सुख नहीं है। माताके पेटमें प्राणी नौ महीने तक घोर नरक-कुण्ड में पड़ा-पड़ा सड़ता है। वहाँ परमात्मासे बारम्बार चिनय करता है, कि मुझे इस नरकसे बाहर कीजिये। मैं बाहर जाते ही, केवल आपका भजन करूँगा; पर बाहर आते ही, वह सब भूल जाता है। उसे अपने वादेका ध्यान भी नहीं रहता। बाल्यावस्था वह खेल-कूद या पढ़ने-लिखनेमें गँवा देता है; तदुणावस्थामें वह तहणीके फन्देमें फँसा रहता है और बुढ़ापेमें नाती-पोतों और दोहितोंका सुख देखना चाहता है। इसी तरह उसकी सारी उम्र बीत जाती है और जिस कामके लिये वह यहाँ आया था, वह काम अधूरा या बिना हुआ रह जाता है और समय पूरा होने पर, काल बोटी पकड़ कर ले जाता है। इसके बाद; वह फिर जन्म लेता और मरता है। इस तरह उसे ८४ लक्ष योनियोंमें जन्म लेना

( ४३६ )

पड़ता है ; तब कहाँ फिर ऐसा अवसर उसे मिलता है ; यानी जन्म-मरणकी फाँसी काटनेवाली मनुष्य-देह मिलती है । अतः ज्ञानीको चाहिये कि, अपने मनको अपने अधीन करे और पकाग्र चित्तसे परमात्माकी उपासनामें लबलीन हो जाय । इस दुर्लभ मनुष्य-देहको बुथा न गँवावे ।

महात्मा चरणदासने यही सब मोह-मदिराका नशा उतारनेवाली और गफ़लतको दूर करनेवाली बातें नीचेके भजनमें बड़ी ही खूबीसे अदा की हैं :—

भजन ( राग जंगला ) ।

पीले रे प्याला हो जा मतवाला, प्याला श्रेम हरीरसका रे ॥८॥ पाप-पुण्य दोउ भुगतन आये, कौन तेरा और तू किसका रे ? जो दम जीवे प्रभुके गुण गाले, धन औंन सुपना निशका रे ॥९॥ बाल अवस्था खेल गँवाई, तरुण भया नारी-बश का रे । बूढ़ भया कफ वायने चेरा, खाटपरा नहि जाय मसका रे ॥१०॥ नाम-कमल-बिच है कस्तुरी, कैसे भरम मिटे पशुका रे । मन सतगुरु यों भरमत डोले, जैसे सिरग फिरै बन का रे ॥११॥ लख चौरासीसे उबरा चाहे, छोड़ कामिनी का चसका रे । श्रेम लगन “चरणदास” कहत हैं, नखसिख स्वास भरा विषका रे ॥१२॥

बुढ़ापेमें तो मोक्ष-रूपी सोना बना लो ।

मनुष्यकी आयु फूटे बड़ेके जलकी तरह नित्य निकली चली जा रही है । प्राणी हर क्षण काङ्क्षे गालमें है । जबतक

( ४४० )

वह कालके गलेके नीचे नहीं उतारता, तभी तक खैर है। पर मज़ा यह कि, मनुष्य आप कालके गालमें है; तोभी विषयों-का पीछा नहीं छोड़ता। इसकी दशा उस मैडकके समान है, जो साँपके मुँहमें फँसा हुआ मच्छरोंको मारनेकी चेष्टा करता था। मनुष्य नित्य देखता है कि, करोड़पति अरबपति और राजा महाराजा अपनी धन-दौलतको यहीं छोड़-छोड़ कर चले जा रहे हैं; पर फिर भी उसे होश नहीं होता! भला इस बेहोशी और ग़फ़लतका भी कोई ठिकाना है! बचपन और जवानोंमें ही: परमात्मासे प्रीति करनी चाहिये। अगर उन अवस्थाओंमें भूल हो गई हो; तो बुढ़ापेमें तो अवश्य ही सम्बल जाना चाहिये। यह काया पारसमणि है। यह इसलिये मिली है कि, इससे मोक्ष रूपी सोना बना लिया जाय। जो लोग देर करते हैं, अवधि बीतने पर, यह पारसमणि उनसे छीन ली जाती है और वे मोक्ष-रूपी सोना नहीं बना पाते; यानी मोक्ष-लाभके उपाय करनेके पहले ही काल उन्हें ले जाता है।

पारस पत्थरकी बटिया।

एक महापुरुषके पास पारस-पत्थरकी बटिया थी। उन्होंने एक दृढ़ि गृहस्थपर दयाकर, उसे वह बटिया दे दी और कह दिया कि, हम तीर्थ करने जाते हैं; १८ महीने बाद लौटेंगे; तब तक तुम इस बटियासे इच्छानुसार सोना बनाकर, अपना

( ४४१ )

दाण्डि-दुःख दूर कर लेना । महात्मा चले गये । गृहस्थने बाज़ारमें जाकर लोहिका भाव पूछा । भाव मँहगा था, इस-लिये सोचा कि, जब लोहा सस्ता होगा, ठाकर भट सोना बना लूँगा । इस तरह १८ महीनोंमें जब दो चार दिन रह गये, तब वह लोहा गाड़ियों पर लढ़ाकर लाया । विचार किया—“अब क्या देर है, भट सोना बना ले गे ।” उसे तो ख़याल रहा नहीं और १८ वे’ मासका आखिरी दिन आ गया । महात्मा भी आ गये । उन्होंने आते ही अपनी पारसमणि माँगो । गृहस्थने कहा—“मैं आज शामको ही आपकी बटिया दे दूँगा ।” महात्माने कहा—“अब समय हो गया ; एक क्षण भी बटिया तुम्हारे पास रह नहीं सकती ।” महात्माने बटिया ले ली । गृहस्थ रोता और हाथ मलता रह गया । यह दृष्टान्त है । दृष्टान्त यह है कि, समय पूरा हो जाने पर, काल इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करता : कि, किसीका काम हुआ है या नहीं ; वह तो प्राणीको लेकर चलता बनता है ; अतः समय रहते मोक्षका उपाय करना चाहिये । आग लगने पर कूआ खोदनेसे कोई लाभ नहीं । बुढ़ापे या मौतका पेशखीमा आया देखकर भी होश न करना भारी नादानी है ।

मनुष्यो ! विषयोंको छोड़ो और परलोक बनाने क्री फिक करो ; क्योंकि काल तुम्हारे सिरों पर उसी तरह मँडरा रहा है ; जिस तरह बाज़ चिड़ियाकी घातमें मँडराया करता है । महात्मा सुन्दरदासजीने खब कहा है :—

( ४४२ )

( ? )

तू अति गंफिल होइ रह्यो शठ, कुञ्जर ज्यूँ कछु शंक न आनै । माय नहीं तनमें अपनो बल, मत्त भयो विषया-सुख ठानै । खोंसत खात सबै दिन बीतत, नीत अनौत कछु नहि जानै । “सुन्दर” केहरि काल महारिपु, दन्त उखारि कुम्भस्थल मानै* ॥

अरे शठ ! तू बहुत ही गंफिल और असावधान हो रहा है। हाथीकी तरह मनमें भय नहीं करता। तेरे शरीरमें तेरा बल नहीं समाता। मतवाला होकर विषय-भोगोंका आनन्द लूट रहा है। छीनते और खाते तेरे दिन बीते जा रहे हैं। तू न्याय-अन्याय कुछ नहीं समझता। “सुन्दरदास” कहते हैं, घोर शत्रु कालरूपी सिंह तेरे दांतोंको उखाड़ कर तेरा कुम्भस्थल फाड़ डालेगा।

  • इस कवितामें मनुष्य को हाथी और मौत को सिंह माना है। सिंह जिस तरह हाथीके दांत उखाड़ कर, उसके कुम्भस्थलको चीर डालता है; उसी तरह काल-सिंह मनुष्यको मार डालता है। (हाथी को पेशानों के ऊपरी भागमें, सामने ही, जो दो गोले होते हैं। उन्हें “कुम्भस्थल” कहते हैं।

( ४४३ )

( २ )

सन्त सदा उपदेश बतावत ।

केश सबै सिर श्वेत भये हैं ॥

तू ममता अजहूँ नहि छँड़त ।

मौतहु आई सन्देश दये हैं ॥

आजु कि काल चलै उठि मूरख ।

तेरे हि देखत केते गये हैं ॥

“सुन्दर” कयूँ नहि राम सँभारत ? ।

या जगमें कहु कौन रहे हैं ? ॥

सन्त लोग सदा उपदेश देते हैं। तेरे सिरके बाल सफेद हो गये हैं; मौतने अपना सन्देश भेज दिया है। अरे मूर्ख! आज या कल तू उठ जायगा। पर अफसोस! इतनी झूबर पाने पर भी, तू होश नहीं करता और अब तक भी ममता नहीं छोड़ता! अरे शठ! तेरी आँखों-देखते-देखते कितने ही चले गये हैं; क्या तू यहाँ ही रहा आबेगा? इस जगत्में कौन रहा है? अब भी तू भगवान् को याद क्यों नहीं करता?

( ३ )

करत-करत धन्ध, कछु न जाने अन्य ।

आवत निकट दिन, आगले चपाकदे ॥

जैसे बाज तीतर कुँदावत है अचानक ।

जैसे बक मछरी कुँ, लीलत लपाकदे ॥

( ४४४ )

जैसे मच्छिकाकी घात, मकरी करत आय । जैसे साँप मूसक ऊँ, घसत गपाक दे ॥ चेत रे अचेत नर, “सुन्दर” सँभार राम । ऐसे तोहिँ काल आय, लेइगो टपाक दे ॥

अरे अन्धे ! धन्धोंमें लगकर तुझे होश नहीं, तेरे अन्तिम दिन शीघ्र-शीघ्र नज़दीक आ रहे हैं । जिस तरह बाज़ अचानक आकर तीतरको दबा लेता है, जिस तरह बगुला मछलीको चटसे निगल जाता है, जिस तरह मकड़ी मक्खीकी घातमें लगती रहती है, जिस तरह साँप चूहेको गपसे गपक लेता है ; उसी तरह काल तुम्ह पर ऋषट्टा मारना ही चाहता है । अरे ग्राफिल मनुष्य ! हेशकर और भगवान्को याद कर ।

( ४ )

मेरो देह, मेरो गेह, मेरो परिवार सब । मेरो धन-माल, मैं तो बहु विधि भारो ॥ मेरे सब सेवक, हुकम कोउ मेटे नाहिं । मेरी युवतीको मैं तो अधिक पियारो ॥ मेरो वंश ऊँचो, मेरे बाप-दादा ऐसे भये । करत बड़ाई, मैं तो जगत-उजारो ॥ “सुन्दर” कहत, मेरो-मेरो करि जाने शठ । ऐसे नाहिं जाने, मैं तो काल ही को चारो ॥ यह मेरी देह है, यह मेरा घर है, यह सब मेरा कुटुम्ब है,

( ४४५ )

यह मेरा धन-माल है, मैं हर तरहसे बड़ा आदमी हूँ। मेरे सब नौकर हैं, जो मेरी आज्ञाको उल्लङ्घन नहीं करते। मैं अपनी युवतीका बहुत ही प्यारा हूँ ; मेरा कुल और वंश ऊँचा है ; मेरे बाप-दादा ऐसे नामी हुए ; मैं जगत्का उजियारा हूँ ; इस तरह मनुष्य अपनी बड़ाई करता और शेष्ठी बधरता है। “सुन्दरदास” कहते हैं, शठ मेरा ही मेरा करता है ; पर यह नहीं जानता कि, मैं स्वयं ही मौतका चारा हूँ।

( ५ )

माया जोरि जोरि, नर राखत जतन करि । कहत है एक दिन, मेरे काम आइ है ॥ तोहि तो मरत, कछु बेर नहिं लागे शठ । देखत-हि-देखत, बवूलासो बिलाइ है ॥ धन तो धरयो ही रहे, चलत न कौड़ी गहै । रीते हाथनसे जैसो आयो, तैसो ही जाइ है ॥ करिले सुकृत, यह बेरिया न आवे फेरि । ''सुन्दर'' कहत, नर पुनि पछिताइ है ॥

मनुष्य धन जोड़-जोड़ कर रखता है और कहता है कि, यह एक दिन मेरे काम आवेगा। अरे मूर्ख ! तुम्हें तो मरते देर न लगेगी ; देखते-देखते, पानीके बवूलेकी तरह, बिलाय जायगा। तेरा धन यहाँका यहीं रखवा रह जायगा ; चलते

( ४४६ )

समय कौड़ी भी तू साथ न ले जायगा; जिस तरह रीते हाथों आया था, उसी तरह खाली हाथों चला जायगा। अरे मूर्ख! परोपकार या धर्म-पुण्य कर ले, यह मौका फिर न मिलेगा। “सुन्दरदास” जी कहते हैं, अगर हमारी चैतावनी पर ध्यान न देगा, तो अन्त समय पछतावेगा।

किसी कविने मोह-निद्रामें सोनेवाले ग़ाफ़िलको जगाने और उसे अपने कर्तव्य पर आरूढ़ करनेके लिये कैसा अच्छा भजन कहा है :—

भजन ।

मूरख छाँड़ वृथा अभिमान ।टेका॥

औसर बीत चल्थो है तेरो, तू दो दिनको महमान ॥

भूप अनेक भये पृथ्वी पर, रूप तेज बलवान् ।

कौन बच्चो या काल बलीसे; मिट गये नामनिशान ॥१॥

धवल धाम धन गज रथ सेना, नारी चन्द्र-समान ।

अन्त समय सबही को तजके, जाय बही समसान ॥२॥

तज सतसंग भ्रमत विषयनमें, जा विधि मर्षट-स्वान ।

द्वार-भर बैठ न सुमिरन कीनो, जासों होत कल्याण ॥३॥

रे मन मूढ़! अन्त मत भाटके, मेरो कहौ अब मान ।

“नारायण” ब्रजराज कुँवरसे, बेगि करो पहचान ॥४॥

( ४४७ )

दोहा ।

कुपित सिंहनी ज्यों जरा, कुपित शत्रु ज्यों रोग ।

फूटे घट जल ल्यों वयस, तज ब्रह्मिदुत लोग ॥१०६॥

109. Old age stands in front like a ferocious-looking she-wolf. Diseases attack the physical body like so many enemies. Life is leaking away like water from a broken vessel. Still it is strange that men go on doing what will bring them harm in the end !

सजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलंकरणं सुत्रः ॥

तदपि तत्क्षणभंगि करोति चेद्वह कष्टमपंजितताविषेः ॥११०॥

ब्रह्माकी यह अज्ञानता खटकती है, कि वह मनुष्यको गुणोंकी खान, पृथ्वीका भूषण और प्राणियोंमें रत्नरूप बनाता है ; किन्तु उसे क्षणभङ्गुर कर देता है ॥११०॥

मनुष्य समस्त जीवधारियोंमें श्रेष्ठ, अक्षरफुल मन्त्रलुकात; गुणोंका सागर और सृष्टिकी शोभा है। यह सब होने पर भी, उसकी उग्र कुछ नहीं ; वह पानीके बुलबुलेकी तरह क्षणभरमें ही नाश हो जाता है ! ब्रह्मा गुणोंकी खान—पृथिवीके शोभारूप पुरुषको बनाता है, यह तो अच्छी बात है ; किन्तु उसे क्षणभरमें ही नाश कर देता है, यह दुःखकी बात है ! यह विधाताकी मूर्खता है। यदि वह पुरुषको सदा रहनेवाला—अमर और अजर बनाता, तो अच्छा होता। इसमें उसकी