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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४४३ )

( २ )

सन्त सदा उपदेश बतावत ।

केश सबै सिर श्वेत भये हैं ॥

तू ममता अजहूँ नहि छँड़त ।

मौतहु आई सन्देश दये हैं ॥

आजु कि काल चलै उठि मूरख ।

तेरे हि देखत केते गये हैं ॥

“सुन्दर” कयूँ नहि राम सँभारत ? ।

या जगमें कहु कौन रहे हैं ? ॥

सन्त लोग सदा उपदेश देते हैं। तेरे सिरके बाल सफेद हो गये हैं; मौतने अपना सन्देश भेज दिया है। अरे मूर्ख! आज या कल तू उठ जायगा। पर अफसोस! इतनी झूबर पाने पर भी, तू होश नहीं करता और अब तक भी ममता नहीं छोड़ता! अरे शठ! तेरी आँखों-देखते-देखते कितने ही चले गये हैं; क्या तू यहाँ ही रहा आबेगा? इस जगत्में कौन रहा है? अब भी तू भगवान् को याद क्यों नहीं करता?

( ३ )

करत-करत धन्ध, कछु न जाने अन्य ।

आवत निकट दिन, आगले चपाकदे ॥

जैसे बाज तीतर कुँदावत है अचानक ।

जैसे बक मछरी कुँ, लीलत लपाकदे ॥