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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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तू अति गंफिल होइ रह्यो शठ, कुञ्जर ज्यूँ कछु शंक न आनै । माय नहीं तनमें अपनो बल, मत्त भयो विषया-सुख ठानै । खोंसत खात सबै दिन बीतत, नीत अनौत कछु नहि जानै । “सुन्दर” केहरि काल महारिपु, दन्त उखारि कुम्भस्थल मानै* ॥

अरे शठ ! तू बहुत ही गंफिल और असावधान हो रहा है। हाथीकी तरह मनमें भय नहीं करता। तेरे शरीरमें तेरा बल नहीं समाता। मतवाला होकर विषय-भोगोंका आनन्द लूट रहा है। छीनते और खाते तेरे दिन बीते जा रहे हैं। तू न्याय-अन्याय कुछ नहीं समझता। “सुन्दरदास” कहते हैं, घोर शत्रु कालरूपी सिंह तेरे दांतोंको उखाड़ कर तेरा कुम्भस्थल फाड़ डालेगा।

  • इस कवितामें मनुष्य को हाथी और मौत को सिंह माना है। सिंह जिस तरह हाथीके दांत उखाड़ कर, उसके कुम्भस्थलको चीर डालता है; उसी तरह काल-सिंह मनुष्यको मार डालता है। (हाथी को पेशानों के ऊपरी भागमें, सामने ही, जो दो गोले होते हैं। उन्हें “कुम्भस्थल” कहते हैं।