वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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दाण्डि-दुःख दूर कर लेना । महात्मा चले गये । गृहस्थने बाज़ारमें जाकर लोहिका भाव पूछा । भाव मँहगा था, इस-लिये सोचा कि, जब लोहा सस्ता होगा, ठाकर भट सोना बना लूँगा । इस तरह १८ महीनोंमें जब दो चार दिन रह गये, तब वह लोहा गाड़ियों पर लढ़ाकर लाया । विचार किया—“अब क्या देर है, भट सोना बना ले गे ।” उसे तो ख़याल रहा नहीं और १८ वे’ मासका आखिरी दिन आ गया । महात्मा भी आ गये । उन्होंने आते ही अपनी पारसमणि माँगो । गृहस्थने कहा—“मैं आज शामको ही आपकी बटिया दे दूँगा ।” महात्माने कहा—“अब समय हो गया ; एक क्षण भी बटिया तुम्हारे पास रह नहीं सकती ।” महात्माने बटिया ले ली । गृहस्थ रोता और हाथ मलता रह गया । यह दृष्टान्त है । दृष्टान्त यह है कि, समय पूरा हो जाने पर, काल इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करता : कि, किसीका काम हुआ है या नहीं ; वह तो प्राणीको लेकर चलता बनता है ; अतः समय रहते मोक्षका उपाय करना चाहिये । आग लगने पर कूआ खोदनेसे कोई लाभ नहीं । बुढ़ापे या मौतका पेशखीमा आया देखकर भी होश न करना भारी नादानी है ।
मनुष्यो ! विषयोंको छोड़ो और परलोक बनाने क्री फिक करो ; क्योंकि काल तुम्हारे सिरों पर उसी तरह मँडरा रहा है ; जिस तरह बाज़ चिड़ियाकी घातमें मँडराया करता है । महात्मा सुन्दरदासजीने खब कहा है :—