वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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वह कालके गलेके नीचे नहीं उतारता, तभी तक खैर है। पर मज़ा यह कि, मनुष्य आप कालके गालमें है; तोभी विषयों-का पीछा नहीं छोड़ता। इसकी दशा उस मैडकके समान है, जो साँपके मुँहमें फँसा हुआ मच्छरोंको मारनेकी चेष्टा करता था। मनुष्य नित्य देखता है कि, करोड़पति अरबपति और राजा महाराजा अपनी धन-दौलतको यहीं छोड़-छोड़ कर चले जा रहे हैं; पर फिर भी उसे होश नहीं होता! भला इस बेहोशी और ग़फ़लतका भी कोई ठिकाना है! बचपन और जवानोंमें ही: परमात्मासे प्रीति करनी चाहिये। अगर उन अवस्थाओंमें भूल हो गई हो; तो बुढ़ापेमें तो अवश्य ही सम्बल जाना चाहिये। यह काया पारसमणि है। यह इसलिये मिली है कि, इससे मोक्ष रूपी सोना बना लिया जाय। जो लोग देर करते हैं, अवधि बीतने पर, यह पारसमणि उनसे छीन ली जाती है और वे मोक्ष-रूपी सोना नहीं बना पाते; यानी मोक्ष-लाभके उपाय करनेके पहले ही काल उन्हें ले जाता है।
पारस पत्थरकी बटिया।
एक महापुरुषके पास पारस-पत्थरकी बटिया थी। उन्होंने एक दृढ़ि गृहस्थपर दयाकर, उसे वह बटिया दे दी और कह दिया कि, हम तीर्थ करने जाते हैं; १८ महीने बाद लौटेंगे; तब तक तुम इस बटियासे इच्छानुसार सोना बनाकर, अपना