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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पड़ता है ; तब कहाँ फिर ऐसा अवसर उसे मिलता है ; यानी जन्म-मरणकी फाँसी काटनेवाली मनुष्य-देह मिलती है । अतः ज्ञानीको चाहिये कि, अपने मनको अपने अधीन करे और पकाग्र चित्तसे परमात्माकी उपासनामें लबलीन हो जाय । इस दुर्लभ मनुष्य-देहको बुथा न गँवावे ।

महात्मा चरणदासने यही सब मोह-मदिराका नशा उतारनेवाली और गफ़लतको दूर करनेवाली बातें नीचेके भजनमें बड़ी ही खूबीसे अदा की हैं :—

भजन ( राग जंगला ) ।

पीले रे प्याला हो जा मतवाला, प्याला श्रेम हरीरसका रे ॥८॥ पाप-पुण्य दोउ भुगतन आये, कौन तेरा और तू किसका रे ? जो दम जीवे प्रभुके गुण गाले, धन औंन सुपना निशका रे ॥९॥ बाल अवस्था खेल गँवाई, तरुण भया नारी-बश का रे । बूढ़ भया कफ वायने चेरा, खाटपरा नहि जाय मसका रे ॥१०॥ नाम-कमल-बिच है कस्तुरी, कैसे भरम मिटे पशुका रे । मन सतगुरु यों भरमत डोले, जैसे सिरग फिरै बन का रे ॥११॥ लख चौरासीसे उबरा चाहे, छोड़ कामिनी का चसका रे । श्रेम लगन “चरणदास” कहत हैं, नखसिख स्वास भरा विषका रे ॥१२॥

बुढ़ापेमें तो मोक्ष-रूपी सोना बना लो ।

मनुष्यकी आयु फूटे बड़ेके जलकी तरह नित्य निकली चली जा रही है । प्राणी हर क्षण काङ्क्षे गालमें है । जबतक