भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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इस घोर दुःखको सुख समझते हैं। भगवान् जाने उन्हें इन घोर दुःखोंको देखकर भी कैसे सन्तोष होता है? भगवान् शङ्कराचार्य कहते हैं:—

यावज्जननं तावन्मरणं, तावज्जननी जठरे शयनम् ।

इति संसारे स्फुटतर दोषः, कथमिह मानव! तव सन्तोषः? ।।

जब तक जन्म ग्रहण करना है, तब तक मरना और माता के पेटमें सोना है। संसारमें यह दोष स्पष्ट है। हे मनुष्य! फिर भी तुझे इस जगत्से कैसे सन्तोष है?

रोज़ आँखोंसे देखते हैं, कि इस संसारमें जरा भी सुख नहीं है। माताके पेटमें प्राणी नौ महीने तक घोर नरक-कुण्ड में पड़ा-पड़ा सड़ता है। वहाँ परमात्मासे बारम्बार चिनय करता है, कि मुझे इस नरकसे बाहर कीजिये। मैं बाहर जाते ही, केवल आपका भजन करूँगा; पर बाहर आते ही, वह सब भूल जाता है। उसे अपने वादेका ध्यान भी नहीं रहता। बाल्यावस्था वह खेल-कूद या पढ़ने-लिखनेमें गँवा देता है; तदुणावस्थामें वह तहणीके फन्देमें फँसा रहता है और बुढ़ापेमें नाती-पोतों और दोहितोंका सुख देखना चाहता है। इसी तरह उसकी सारी उम्र बीत जाती है और जिस कामके लिये वह यहाँ आया था, वह काम अधूरा या बिना हुआ रह जाता है और समय पूरा होने पर, काल बोटी पकड़ कर ले जाता है। इसके बाद; वह फिर जन्म लेता और मरता है। इस तरह उसे ८४ लक्ष योनियोंमें जन्म लेना