वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ४३८ )
इस घोर दुःखको सुख समझते हैं। भगवान् जाने उन्हें इन घोर दुःखोंको देखकर भी कैसे सन्तोष होता है? भगवान् शङ्कराचार्य कहते हैं:—
यावज्जननं तावन्मरणं, तावज्जननी जठरे शयनम् ।
इति संसारे स्फुटतर दोषः, कथमिह मानव! तव सन्तोषः? ।।
जब तक जन्म ग्रहण करना है, तब तक मरना और माता के पेटमें सोना है। संसारमें यह दोष स्पष्ट है। हे मनुष्य! फिर भी तुझे इस जगत्से कैसे सन्तोष है?
रोज़ आँखोंसे देखते हैं, कि इस संसारमें जरा भी सुख नहीं है। माताके पेटमें प्राणी नौ महीने तक घोर नरक-कुण्ड में पड़ा-पड़ा सड़ता है। वहाँ परमात्मासे बारम्बार चिनय करता है, कि मुझे इस नरकसे बाहर कीजिये। मैं बाहर जाते ही, केवल आपका भजन करूँगा; पर बाहर आते ही, वह सब भूल जाता है। उसे अपने वादेका ध्यान भी नहीं रहता। बाल्यावस्था वह खेल-कूद या पढ़ने-लिखनेमें गँवा देता है; तदुणावस्थामें वह तहणीके फन्देमें फँसा रहता है और बुढ़ापेमें नाती-पोतों और दोहितोंका सुख देखना चाहता है। इसी तरह उसकी सारी उम्र बीत जाती है और जिस कामके लिये वह यहाँ आया था, वह काम अधूरा या बिना हुआ रह जाता है और समय पूरा होने पर, काल बोटी पकड़ कर ले जाता है। इसके बाद; वह फिर जन्म लेता और मरता है। इस तरह उसे ८४ लक्ष योनियोंमें जन्म लेना
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पड़ता है ; तब कहाँ फिर ऐसा अवसर उसे मिलता है ; यानी जन्म-मरणकी फाँसी काटनेवाली मनुष्य-देह मिलती है । अतः ज्ञानीको चाहिये कि, अपने मनको अपने अधीन करे और पकाग्र चित्तसे परमात्माकी उपासनामें लबलीन हो जाय । इस दुर्लभ मनुष्य-देहको बुथा न गँवावे ।
महात्मा चरणदासने यही सब मोह-मदिराका नशा उतारनेवाली और गफ़लतको दूर करनेवाली बातें नीचेके भजनमें बड़ी ही खूबीसे अदा की हैं :—
भजन ( राग जंगला ) ।
पीले रे प्याला हो जा मतवाला, प्याला श्रेम हरीरसका रे ॥८॥ पाप-पुण्य दोउ भुगतन आये, कौन तेरा और तू किसका रे ? जो दम जीवे प्रभुके गुण गाले, धन औंन सुपना निशका रे ॥९॥ बाल अवस्था खेल गँवाई, तरुण भया नारी-बश का रे । बूढ़ भया कफ वायने चेरा, खाटपरा नहि जाय मसका रे ॥१०॥ नाम-कमल-बिच है कस्तुरी, कैसे भरम मिटे पशुका रे । मन सतगुरु यों भरमत डोले, जैसे सिरग फिरै बन का रे ॥११॥ लख चौरासीसे उबरा चाहे, छोड़ कामिनी का चसका रे । श्रेम लगन “चरणदास” कहत हैं, नखसिख स्वास भरा विषका रे ॥१२॥
बुढ़ापेमें तो मोक्ष-रूपी सोना बना लो ।
मनुष्यकी आयु फूटे बड़ेके जलकी तरह नित्य निकली चली जा रही है । प्राणी हर क्षण काङ्क्षे गालमें है । जबतक
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वह कालके गलेके नीचे नहीं उतारता, तभी तक खैर है। पर मज़ा यह कि, मनुष्य आप कालके गालमें है; तोभी विषयों-का पीछा नहीं छोड़ता। इसकी दशा उस मैडकके समान है, जो साँपके मुँहमें फँसा हुआ मच्छरोंको मारनेकी चेष्टा करता था। मनुष्य नित्य देखता है कि, करोड़पति अरबपति और राजा महाराजा अपनी धन-दौलतको यहीं छोड़-छोड़ कर चले जा रहे हैं; पर फिर भी उसे होश नहीं होता! भला इस बेहोशी और ग़फ़लतका भी कोई ठिकाना है! बचपन और जवानोंमें ही: परमात्मासे प्रीति करनी चाहिये। अगर उन अवस्थाओंमें भूल हो गई हो; तो बुढ़ापेमें तो अवश्य ही सम्बल जाना चाहिये। यह काया पारसमणि है। यह इसलिये मिली है कि, इससे मोक्ष रूपी सोना बना लिया जाय। जो लोग देर करते हैं, अवधि बीतने पर, यह पारसमणि उनसे छीन ली जाती है और वे मोक्ष-रूपी सोना नहीं बना पाते; यानी मोक्ष-लाभके उपाय करनेके पहले ही काल उन्हें ले जाता है।
पारस पत्थरकी बटिया।
एक महापुरुषके पास पारस-पत्थरकी बटिया थी। उन्होंने एक दृढ़ि गृहस्थपर दयाकर, उसे वह बटिया दे दी और कह दिया कि, हम तीर्थ करने जाते हैं; १८ महीने बाद लौटेंगे; तब तक तुम इस बटियासे इच्छानुसार सोना बनाकर, अपना
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दाण्डि-दुःख दूर कर लेना । महात्मा चले गये । गृहस्थने बाज़ारमें जाकर लोहिका भाव पूछा । भाव मँहगा था, इस-लिये सोचा कि, जब लोहा सस्ता होगा, ठाकर भट सोना बना लूँगा । इस तरह १८ महीनोंमें जब दो चार दिन रह गये, तब वह लोहा गाड़ियों पर लढ़ाकर लाया । विचार किया—“अब क्या देर है, भट सोना बना ले गे ।” उसे तो ख़याल रहा नहीं और १८ वे’ मासका आखिरी दिन आ गया । महात्मा भी आ गये । उन्होंने आते ही अपनी पारसमणि माँगो । गृहस्थने कहा—“मैं आज शामको ही आपकी बटिया दे दूँगा ।” महात्माने कहा—“अब समय हो गया ; एक क्षण भी बटिया तुम्हारे पास रह नहीं सकती ।” महात्माने बटिया ले ली । गृहस्थ रोता और हाथ मलता रह गया । यह दृष्टान्त है । दृष्टान्त यह है कि, समय पूरा हो जाने पर, काल इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करता : कि, किसीका काम हुआ है या नहीं ; वह तो प्राणीको लेकर चलता बनता है ; अतः समय रहते मोक्षका उपाय करना चाहिये । आग लगने पर कूआ खोदनेसे कोई लाभ नहीं । बुढ़ापे या मौतका पेशखीमा आया देखकर भी होश न करना भारी नादानी है ।
मनुष्यो ! विषयोंको छोड़ो और परलोक बनाने क्री फिक करो ; क्योंकि काल तुम्हारे सिरों पर उसी तरह मँडरा रहा है ; जिस तरह बाज़ चिड़ियाकी घातमें मँडराया करता है । महात्मा सुन्दरदासजीने खब कहा है :—
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( ? )
तू अति गंफिल होइ रह्यो शठ, कुञ्जर ज्यूँ कछु शंक न आनै । माय नहीं तनमें अपनो बल, मत्त भयो विषया-सुख ठानै । खोंसत खात सबै दिन बीतत, नीत अनौत कछु नहि जानै । “सुन्दर” केहरि काल महारिपु, दन्त उखारि कुम्भस्थल मानै* ॥
अरे शठ ! तू बहुत ही गंफिल और असावधान हो रहा है। हाथीकी तरह मनमें भय नहीं करता। तेरे शरीरमें तेरा बल नहीं समाता। मतवाला होकर विषय-भोगोंका आनन्द लूट रहा है। छीनते और खाते तेरे दिन बीते जा रहे हैं। तू न्याय-अन्याय कुछ नहीं समझता। “सुन्दरदास” कहते हैं, घोर शत्रु कालरूपी सिंह तेरे दांतोंको उखाड़ कर तेरा कुम्भस्थल फाड़ डालेगा।
- इस कवितामें मनुष्य को हाथी और मौत को सिंह माना है। सिंह जिस तरह हाथीके दांत उखाड़ कर, उसके कुम्भस्थलको चीर डालता है; उसी तरह काल-सिंह मनुष्यको मार डालता है। (हाथी को पेशानों के ऊपरी भागमें, सामने ही, जो दो गोले होते हैं। उन्हें “कुम्भस्थल” कहते हैं।
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( २ )
सन्त सदा उपदेश बतावत ।
केश सबै सिर श्वेत भये हैं ॥
तू ममता अजहूँ नहि छँड़त ।
मौतहु आई सन्देश दये हैं ॥
आजु कि काल चलै उठि मूरख ।
तेरे हि देखत केते गये हैं ॥
“सुन्दर” कयूँ नहि राम सँभारत ? ।
या जगमें कहु कौन रहे हैं ? ॥
सन्त लोग सदा उपदेश देते हैं। तेरे सिरके बाल सफेद हो गये हैं; मौतने अपना सन्देश भेज दिया है। अरे मूर्ख! आज या कल तू उठ जायगा। पर अफसोस! इतनी झूबर पाने पर भी, तू होश नहीं करता और अब तक भी ममता नहीं छोड़ता! अरे शठ! तेरी आँखों-देखते-देखते कितने ही चले गये हैं; क्या तू यहाँ ही रहा आबेगा? इस जगत्में कौन रहा है? अब भी तू भगवान् को याद क्यों नहीं करता?
( ३ )
करत-करत धन्ध, कछु न जाने अन्य ।
आवत निकट दिन, आगले चपाकदे ॥
जैसे बाज तीतर कुँदावत है अचानक ।
जैसे बक मछरी कुँ, लीलत लपाकदे ॥
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जैसे मच्छिकाकी घात, मकरी करत आय । जैसे साँप मूसक ऊँ, घसत गपाक दे ॥ चेत रे अचेत नर, “सुन्दर” सँभार राम । ऐसे तोहिँ काल आय, लेइगो टपाक दे ॥
अरे अन्धे ! धन्धोंमें लगकर तुझे होश नहीं, तेरे अन्तिम दिन शीघ्र-शीघ्र नज़दीक आ रहे हैं । जिस तरह बाज़ अचानक आकर तीतरको दबा लेता है, जिस तरह बगुला मछलीको चटसे निगल जाता है, जिस तरह मकड़ी मक्खीकी घातमें लगती रहती है, जिस तरह साँप चूहेको गपसे गपक लेता है ; उसी तरह काल तुम्ह पर ऋषट्टा मारना ही चाहता है । अरे ग्राफिल मनुष्य ! हेशकर और भगवान्को याद कर ।
( ४ )
मेरो देह, मेरो गेह, मेरो परिवार सब । मेरो धन-माल, मैं तो बहु विधि भारो ॥ मेरे सब सेवक, हुकम कोउ मेटे नाहिं । मेरी युवतीको मैं तो अधिक पियारो ॥ मेरो वंश ऊँचो, मेरे बाप-दादा ऐसे भये । करत बड़ाई, मैं तो जगत-उजारो ॥ “सुन्दर” कहत, मेरो-मेरो करि जाने शठ । ऐसे नाहिं जाने, मैं तो काल ही को चारो ॥ यह मेरी देह है, यह मेरा घर है, यह सब मेरा कुटुम्ब है,
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यह मेरा धन-माल है, मैं हर तरहसे बड़ा आदमी हूँ। मेरे सब नौकर हैं, जो मेरी आज्ञाको उल्लङ्घन नहीं करते। मैं अपनी युवतीका बहुत ही प्यारा हूँ ; मेरा कुल और वंश ऊँचा है ; मेरे बाप-दादा ऐसे नामी हुए ; मैं जगत्का उजियारा हूँ ; इस तरह मनुष्य अपनी बड़ाई करता और शेष्ठी बधरता है। “सुन्दरदास” कहते हैं, शठ मेरा ही मेरा करता है ; पर यह नहीं जानता कि, मैं स्वयं ही मौतका चारा हूँ।
( ५ )
माया जोरि जोरि, नर राखत जतन करि । कहत है एक दिन, मेरे काम आइ है ॥ तोहि तो मरत, कछु बेर नहिं लागे शठ । देखत-हि-देखत, बवूलासो बिलाइ है ॥ धन तो धरयो ही रहे, चलत न कौड़ी गहै । रीते हाथनसे जैसो आयो, तैसो ही जाइ है ॥ करिले सुकृत, यह बेरिया न आवे फेरि । ''सुन्दर'' कहत, नर पुनि पछिताइ है ॥
मनुष्य धन जोड़-जोड़ कर रखता है और कहता है कि, यह एक दिन मेरे काम आवेगा। अरे मूर्ख ! तुम्हें तो मरते देर न लगेगी ; देखते-देखते, पानीके बवूलेकी तरह, बिलाय जायगा। तेरा धन यहाँका यहीं रखवा रह जायगा ; चलते
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समय कौड़ी भी तू साथ न ले जायगा; जिस तरह रीते हाथों आया था, उसी तरह खाली हाथों चला जायगा। अरे मूर्ख! परोपकार या धर्म-पुण्य कर ले, यह मौका फिर न मिलेगा। “सुन्दरदास” जी कहते हैं, अगर हमारी चैतावनी पर ध्यान न देगा, तो अन्त समय पछतावेगा।
किसी कविने मोह-निद्रामें सोनेवाले ग़ाफ़िलको जगाने और उसे अपने कर्तव्य पर आरूढ़ करनेके लिये कैसा अच्छा भजन कहा है :—
भजन ।
मूरख छाँड़ वृथा अभिमान ।टेका॥
औसर बीत चल्थो है तेरो, तू दो दिनको महमान ॥
भूप अनेक भये पृथ्वी पर, रूप तेज बलवान् ।
कौन बच्चो या काल बलीसे; मिट गये नामनिशान ॥१॥
धवल धाम धन गज रथ सेना, नारी चन्द्र-समान ।
अन्त समय सबही को तजके, जाय बही समसान ॥२॥
तज सतसंग भ्रमत विषयनमें, जा विधि मर्षट-स्वान ।
द्वार-भर बैठ न सुमिरन कीनो, जासों होत कल्याण ॥३॥
रे मन मूढ़! अन्त मत भाटके, मेरो कहौ अब मान ।
“नारायण” ब्रजराज कुँवरसे, बेगि करो पहचान ॥४॥
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दोहा ।
कुपित सिंहनी ज्यों जरा, कुपित शत्रु ज्यों रोग ।
फूटे घट जल ल्यों वयस, तज ब्रह्मिदुत लोग ॥१०६॥
109. Old age stands in front like a ferocious-looking she-wolf. Diseases attack the physical body like so many enemies. Life is leaking away like water from a broken vessel. Still it is strange that men go on doing what will bring them harm in the end !
सजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलंकरणं सुत्रः ॥
तदपि तत्क्षणभंगि करोति चेद्वह कष्टमपंजितताविषेः ॥११०॥
ब्रह्माकी यह अज्ञानता खटकती है, कि वह मनुष्यको गुणोंकी खान, पृथ्वीका भूषण और प्राणियोंमें रत्नरूप बनाता है ; किन्तु उसे क्षणभङ्गुर कर देता है ॥११०॥
मनुष्य समस्त जीवधारियोंमें श्रेष्ठ, अक्षरफुल मन्त्रलुकात; गुणोंका सागर और सृष्टिकी शोभा है। यह सब होने पर भी, उसकी उग्र कुछ नहीं ; वह पानीके बुलबुलेकी तरह क्षणभरमें ही नाश हो जाता है ! ब्रह्मा गुणोंकी खान—पृथिवीके शोभारूप पुरुषको बनाता है, यह तो अच्छी बात है ; किन्तु उसे क्षणभरमें ही नाश कर देता है, यह दुःखकी बात है ! यह विधाताकी मूर्खता है। यदि वह पुरुषको सदा रहनेवाला—अमर और अजर बनाता, तो अच्छा होता। इसमें उसकी
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बुद्धिमत्ता दीखती । क्योंकि अपने बाग़में आप ही वृक्ष लगा कर, आप ही जल सौंच और बड़ाकर, अपने ही हाथोंसे अपने लगाये हुए वृक्षको कोई नहीं काटता । जो ऐसा करता है, वह मूर्ख हो समझा जाता है ।
विधाता की औरभी ग़लतियों ।
—*—
इस सृष्टिकी रचनामें, विधाताने अपनी अनुपम कारीगरी और चातुरीके जो काम किये हैं ; उन्हें देखकर मनुष्यकी अकृदंग रह जाती है । तरह-तरहके फल-फूल और वृक्ष-लता-पत्रादि ; नाना प्रकारके जल, थल और आकाशमें विचरने वाले प्राणी ; अनगिन्ती तारे और सूरज-चन्द्रमा तथा नील गगन प्रभृतिको देखकर रचयिता की रचनाचातुरीकी इंज़ार दिलसे तारीफ़ करने पड़ती है । निस्सन्देह, विधाता की क्षमता और बुद्धिमत्ता, चातुरी और कारीगरीका पार पाना असम्भव है ; तथापि यह कहना पड़ता है कि, उस चतुर कारीगरने भूले भी बहुत की हैं । जिस तरह उसने मनुष्यको, सृष्टिका सर्दार ( Lord of creation ) बनाकर, क्षणभंगुर करनेकी भूलकी है ; उसी तरह उसने सोनेमें सुगन्ध और ईषमें फूल न लगाने तथा चन्द्रमाको कलङ्गी बनानेकी भूले की हैं । किसीने कहा है :—
( ४४६ )
शशनि खलु कलंकः, कण्टकं पदमनाले, युवतिकुचनिपातः, पक्ता केशजाले । जलधिजलमपेयं, पण्डिते निर्धनत्वं, वयसि धनविवेको, निर्विवेको विधाता ॥
चन्द्रमायें कलङ्क, कमलकी डण्डीमें काँटे, युवतियोंकी छतियोंका गिर जाना, बालोंका सफेद हो जाना, समुद्रके जलका पीने योग्य न होना, विद्वानोंका धनहीन रहना और बुढ़ापेमें धनागमकी चिन्ता रहना,—ये सब विधाताकी मूर्खता का परिचय देते हैं ।
कहाँ तक कहें, विधाताने ऐसी-ऐसी अनेक भूलें की हैं । हमने उसकी भूलोंके चन्द्र नमूने यहाँ दिखा दिये हैं । ये सब भूलें मनमें काँटेकी तरह खटकती हैं ; पर इन सबमें भी, मनुष्य जैसे प्राणीका, क्षणभरमें हो, बचूले की तरह विलाप जाना सब से अधिक खटकता है ।
110. How painful is the lack of wisdom of BRAHMA, who creates man as a mine of all the good qualities, a gem among all creatures and the ornament of the universe, yet makes him perishable in a moment !
गान्धं संकुचितं गतिविंगलितं अग्नि च दन्तावलि- दीर्घिन्शयति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ॥
वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुद्धते हा
कण्ठं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुनोऽप्यभिवाप्यते ॥१११॥
२६
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मनुष्यकी बुद्धावस्था बड़ी खेदजनक है। इस अवस्थामें शरीर सुकड़ जाता है, चाल मन्दी पड़ जाती है, दन्त-पंक्ति टूटकर गिर जाती है, दृष्टि नाश हो जाती है, बहरापन बंद जाता है, मुँह से लार टपकती है, वन्धुवर्ग बातोंसे भी सम्मान नहीं करते, स्त्री भी सेवा नहीं करती और पुत्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥१११॥
बुढ़ापे का चित्र ।
मनुष्यका बुढ़ापा सचमुच ही दुःखोंकी खान है। जिस तरह शत्रु बात लगाये रहते हैं और मौका पाते ही हमला करते हैं, वैसे ही रोग जवानीमें तो दवे-छिपे पड़े रहते हैं, पर बुढ़ापेकी अवाई देखते ही प्राणीपर चढ़ बैठते हैं। बुढ़ापेमें शरीर निकम्मा हो जाता है, खाल झूलने लगती है, इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं, आँखोंसे दिखाई नहीं देता, कानोंसे सुनाई नहीं देता, पैरोंसे चला नहीं जाता और दम बढ़ा करता है। हर समय खों-खों लगी रहती है; दाँत अलग ही कष्ट देते और हिल-हिल कर प्राण लेते हैं। कोई कड़ी चीज़ खाई नहीं जाती। ज़रा भी कड़ी चीज़ दाँतों-तले आनेसे दम निकलने लगता है। जिस समय दन्त-पीड़ाके मारे माथा और कनपटी भंजाने लगते हैं, तब मनुष्य मृत्युको याद करने लगता है। दाँतों पर उस्ताद जोड़ने खूब कहा है :—
A high-contrast black and white photograph showing a close-up of a hand holding the right edge of a book. The page is predominantly white, with a few small, dark specks or imperfections visible near the bottom edge. The book's binding, which appears to be a dark, textured material like cloth or leather, is visible along the right edge. The hand is positioned on the right side of the frame, with fingers gripping the book's edge. The lighting is very bright on the page, creating a stark contrast with the dark background and the hand.
वैराग्यशक्त ॥ ६ ॥
पुत्र स्त्री
— J. Banerjee —
संतुण की बुद्धावस्था बड़ी ख़तरनाक है। शरीर काम नहीं देता, स्त्रो सेवा नहीं करती—देखते ही आँखें निकालती है। पुत्र भी गजू हो जाते हैं।
( ४५१ )
जिन दाँतोसे हँसते थे हमेशा, खिल-खिल ।
अब दर्दसे हैं वही रलाते, हिल-हिल ॥
पीरीमें कहाँ, अब वह जवानीके मज़े ।
ए जौक, बुढ़ापेसे है दाँता-किल-किल ॥
जिन दाँतोसे जवानीमें खिल-खिला खिल-खिलाकर हँसा करते थे, अब बुढ़ापेमें वही हिल-हिल कर हमें रलाते हैं ! ऐ जौक ! बुढ़ापे में अब वह जवानीके मज़े कहाँ हैं ? अब तो इस बुढ़ापे से दाँता-किल-किल है !
महाकवि नज़ीर अकबराबादी “बुढ़ापे” का क्या ही अच्छा चित्र खींचते हैं :—
बुढ़ापा ।
क्या कुहर है यारो, जिसे आ जाय बुढ़ापा ।
और ऐश जवानीके तर्ह, खाय बुढ़ापा ॥
इशरतको मिला खाकमें, गुम लाय बुढ़ापा ।
हर कामको हर बातको, तरसाय बुढ़ापा ॥
सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा ।
आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥१॥
आगे तो परीज़ाद ये, रखते थे हमें घेर ।
आते थे चले आप, जो लगती थी ज़रा देर ॥
( ४५२ )
सो आके बुढ़ापेने किया, हाथ ये अन्धेर । जो दौड़के मिलते थे, वो अब लेते हैं मुँह फेर ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥२॥ क्या यारो, उलट हाथ गया हमसे जमाना । जो शोख कि थे, अपनी निगाहोंके निशाना ॥ डेढ़ है कोई डालके, दादाका बहाना । हँस कर कोई कहता है, कहाँ जाते हो नाना ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥३॥ पूछें जिसे कहता है, वो क्या पूछे है बुढ़ा । आँवे तो ये गुल-शोर ; कहाँ आवे है बुढ़ा ॥ बैठ तो ये है धूम, कहाँ बैठ है बुढ़ा ॥ देखें जिसे वह कहता है, क्या देखे है बुढ़ा ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥४॥ वह जोश नहीं, जिसके कोई खौफ़से दहले । वह जोम नहीं, जिससे कोई बातको सहले ॥ जब फस डूए हाथ, थके पाँव भी पहिले । फिर जिसके जो कुछ शौक में आवे, सोई कहले ॥
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बमुझि जलहौन सरोवर को और भारै कमल-हीन तालाब को खाना रहे है ।
( पृष्ठ ४०० )
वैराग्यशालक
वैराग्यशतक ~~~~~ ६
सभी स्वार्थ के सगे हैं। स्वार्थ बिना कोई किसी का नहीं। देखिये, फख्हीन वृक्षको पत्ती और जले हुए अंगल को हिरन त्याग रहे हैं। पृ० ४०० (शेष पुरतपर देखिये।)
( ४५३ )
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥५॥
करते थे जवानीमें, तो सब आपसे आ चाह । और हुस्न दिखाते थे, वह सब आनके दिलच्छाह।
यह कहर बुढ़ापेने किया, आह नजीर आह ! अब कोई नहीं पूछता, अल्लाह ही अल्लाह ॥
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥
बुढ़ापे में निर्धनता मरण है !
—००५०५००—
यदि मनुष्य जवानोंमें प्रचुर धन कमाकर रख देता है, तब तो बुढ़ापा सुखसे पार हो जाता है ; घरवाले हलवा और मोहन-मोग खिलाते, गरमागरम दूध पिलाते अथवा कोई और सुखसे खाये जाने-योग्य पदार्थ बना देते हैं ; यदि पास पैसा नहीं होता, तो सभी घरवाले हर तरहसे अनादर करते और सूखे टुकड़े सामने रखते हैं ; इच्छा हो बूढ़ा खाय, इच्छा हो न खाय । अगर बूढ़ेके पास धन होता है, तो खी, पुत्र, पौत्र और पुत्री तथा पुत्र-बहुएँ हर समय बूढ़ेकी हाज़िरीमें खड़े रहते हैं ; मुँहसे बात नहीं निकलती और काम हो जाता है । अगर बूढ़ेके पास धन नहीं होता, तो सब उसे त्याग देते हैं ;