वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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जैसे मच्छिकाकी घात, मकरी करत आय । जैसे साँप मूसक ऊँ, घसत गपाक दे ॥ चेत रे अचेत नर, “सुन्दर” सँभार राम । ऐसे तोहिँ काल आय, लेइगो टपाक दे ॥
अरे अन्धे ! धन्धोंमें लगकर तुझे होश नहीं, तेरे अन्तिम दिन शीघ्र-शीघ्र नज़दीक आ रहे हैं । जिस तरह बाज़ अचानक आकर तीतरको दबा लेता है, जिस तरह बगुला मछलीको चटसे निगल जाता है, जिस तरह मकड़ी मक्खीकी घातमें लगती रहती है, जिस तरह साँप चूहेको गपसे गपक लेता है ; उसी तरह काल तुम्ह पर ऋषट्टा मारना ही चाहता है । अरे ग्राफिल मनुष्य ! हेशकर और भगवान्को याद कर ।
( ४ )
मेरो देह, मेरो गेह, मेरो परिवार सब । मेरो धन-माल, मैं तो बहु विधि भारो ॥ मेरे सब सेवक, हुकम कोउ मेटे नाहिं । मेरी युवतीको मैं तो अधिक पियारो ॥ मेरो वंश ऊँचो, मेरे बाप-दादा ऐसे भये । करत बड़ाई, मैं तो जगत-उजारो ॥ “सुन्दर” कहत, मेरो-मेरो करि जाने शठ । ऐसे नाहिं जाने, मैं तो काल ही को चारो ॥ यह मेरी देह है, यह मेरा घर है, यह सब मेरा कुटुम्ब है,