वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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यह मेरा धन-माल है, मैं हर तरहसे बड़ा आदमी हूँ। मेरे सब नौकर हैं, जो मेरी आज्ञाको उल्लङ्घन नहीं करते। मैं अपनी युवतीका बहुत ही प्यारा हूँ ; मेरा कुल और वंश ऊँचा है ; मेरे बाप-दादा ऐसे नामी हुए ; मैं जगत्का उजियारा हूँ ; इस तरह मनुष्य अपनी बड़ाई करता और शेष्ठी बधरता है। “सुन्दरदास” कहते हैं, शठ मेरा ही मेरा करता है ; पर यह नहीं जानता कि, मैं स्वयं ही मौतका चारा हूँ।
( ५ )
माया जोरि जोरि, नर राखत जतन करि । कहत है एक दिन, मेरे काम आइ है ॥ तोहि तो मरत, कछु बेर नहिं लागे शठ । देखत-हि-देखत, बवूलासो बिलाइ है ॥ धन तो धरयो ही रहे, चलत न कौड़ी गहै । रीते हाथनसे जैसो आयो, तैसो ही जाइ है ॥ करिले सुकृत, यह बेरिया न आवे फेरि । ''सुन्दर'' कहत, नर पुनि पछिताइ है ॥
मनुष्य धन जोड़-जोड़ कर रखता है और कहता है कि, यह एक दिन मेरे काम आवेगा। अरे मूर्ख ! तुम्हें तो मरते देर न लगेगी ; देखते-देखते, पानीके बवूलेकी तरह, बिलाय जायगा। तेरा धन यहाँका यहीं रखवा रह जायगा ; चलते