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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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समय कौड़ी भी तू साथ न ले जायगा; जिस तरह रीते हाथों आया था, उसी तरह खाली हाथों चला जायगा। अरे मूर्ख! परोपकार या धर्म-पुण्य कर ले, यह मौका फिर न मिलेगा। “सुन्दरदास” जी कहते हैं, अगर हमारी चैतावनी पर ध्यान न देगा, तो अन्त समय पछतावेगा।

किसी कविने मोह-निद्रामें सोनेवाले ग़ाफ़िलको जगाने और उसे अपने कर्तव्य पर आरूढ़ करनेके लिये कैसा अच्छा भजन कहा है :—

भजन ।

मूरख छाँड़ वृथा अभिमान ।टेका॥

औसर बीत चल्थो है तेरो, तू दो दिनको महमान ॥

भूप अनेक भये पृथ्वी पर, रूप तेज बलवान् ।

कौन बच्चो या काल बलीसे; मिट गये नामनिशान ॥१॥

धवल धाम धन गज रथ सेना, नारी चन्द्र-समान ।

अन्त समय सबही को तजके, जाय बही समसान ॥२॥

तज सतसंग भ्रमत विषयनमें, जा विधि मर्षट-स्वान ।

द्वार-भर बैठ न सुमिरन कीनो, जासों होत कल्याण ॥३॥

रे मन मूढ़! अन्त मत भाटके, मेरो कहौ अब मान ।

“नारायण” ब्रजराज कुँवरसे, बेगि करो पहचान ॥४॥