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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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दोहा ।

कुपित सिंहनी ज्यों जरा, कुपित शत्रु ज्यों रोग ।

फूटे घट जल ल्यों वयस, तज ब्रह्मिदुत लोग ॥१०६॥

109. Old age stands in front like a ferocious-looking she-wolf. Diseases attack the physical body like so many enemies. Life is leaking away like water from a broken vessel. Still it is strange that men go on doing what will bring them harm in the end !

सजति तावदशेषगुणाकरं पुरुषरत्नमलंकरणं सुत्रः ॥

तदपि तत्क्षणभंगि करोति चेद्वह कष्टमपंजितताविषेः ॥११०॥

ब्रह्माकी यह अज्ञानता खटकती है, कि वह मनुष्यको गुणोंकी खान, पृथ्वीका भूषण और प्राणियोंमें रत्नरूप बनाता है ; किन्तु उसे क्षणभङ्गुर कर देता है ॥११०॥

मनुष्य समस्त जीवधारियोंमें श्रेष्ठ, अक्षरफुल मन्त्रलुकात; गुणोंका सागर और सृष्टिकी शोभा है। यह सब होने पर भी, उसकी उग्र कुछ नहीं ; वह पानीके बुलबुलेकी तरह क्षणभरमें ही नाश हो जाता है ! ब्रह्मा गुणोंकी खान—पृथिवीके शोभारूप पुरुषको बनाता है, यह तो अच्छी बात है ; किन्तु उसे क्षणभरमें ही नाश कर देता है, यह दुःखकी बात है ! यह विधाताकी मूर्खता है। यदि वह पुरुषको सदा रहनेवाला—अमर और अजर बनाता, तो अच्छा होता। इसमें उसकी