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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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बुद्धिमत्ता दीखती । क्योंकि अपने बाग़में आप ही वृक्ष लगा कर, आप ही जल सौंच और बड़ाकर, अपने ही हाथोंसे अपने लगाये हुए वृक्षको कोई नहीं काटता । जो ऐसा करता है, वह मूर्ख हो समझा जाता है ।

विधाता की औरभी ग़लतियों ।

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इस सृष्टिकी रचनामें, विधाताने अपनी अनुपम कारीगरी और चातुरीके जो काम किये हैं ; उन्हें देखकर मनुष्यकी अकृदंग रह जाती है । तरह-तरहके फल-फूल और वृक्ष-लता-पत्रादि ; नाना प्रकारके जल, थल और आकाशमें विचरने वाले प्राणी ; अनगिन्ती तारे और सूरज-चन्द्रमा तथा नील गगन प्रभृतिको देखकर रचयिता की रचनाचातुरीकी इंज़ार दिलसे तारीफ़ करने पड़ती है । निस्सन्देह, विधाता की क्षमता और बुद्धिमत्ता, चातुरी और कारीगरीका पार पाना असम्भव है ; तथापि यह कहना पड़ता है कि, उस चतुर कारीगरने भूले भी बहुत की हैं । जिस तरह उसने मनुष्यको, सृष्टिका सर्दार ( Lord of creation ) बनाकर, क्षणभंगुर करनेकी भूलकी है ; उसी तरह उसने सोनेमें सुगन्ध और ईषमें फूल न लगाने तथा चन्द्रमाको कलङ्गी बनानेकी भूले की हैं । किसीने कहा है :—