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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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शशनि खलु कलंकः, कण्टकं पदमनाले, युवतिकुचनिपातः, पक्ता केशजाले । जलधिजलमपेयं, पण्डिते निर्धनत्वं, वयसि धनविवेको, निर्विवेको विधाता ॥

चन्द्रमायें कलङ्क, कमलकी डण्डीमें काँटे, युवतियोंकी छतियोंका गिर जाना, बालोंका सफेद हो जाना, समुद्रके जलका पीने योग्य न होना, विद्वानोंका धनहीन रहना और बुढ़ापेमें धनागमकी चिन्ता रहना,—ये सब विधाताकी मूर्खता का परिचय देते हैं ।

कहाँ तक कहें, विधाताने ऐसी-ऐसी अनेक भूलें की हैं । हमने उसकी भूलोंके चन्द्र नमूने यहाँ दिखा दिये हैं । ये सब भूलें मनमें काँटेकी तरह खटकती हैं ; पर इन सबमें भी, मनुष्य जैसे प्राणीका, क्षणभरमें हो, बचूले की तरह विलाप जाना सब से अधिक खटकता है ।

110. How painful is the lack of wisdom of BRAHMA, who creates man as a mine of all the good qualities, a gem among all creatures and the ornament of the universe, yet makes him perishable in a moment !

गान्धं संकुचितं गतिविंगलितं अग्नि च दन्तावलि- दीर्घिन्शयति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ॥

वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुद्धते हा

कण्ठं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुनोऽप्यभिवाप्यते ॥१११॥

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