वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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मनुष्यकी बुद्धावस्था बड़ी खेदजनक है। इस अवस्थामें शरीर सुकड़ जाता है, चाल मन्दी पड़ जाती है, दन्त-पंक्ति टूटकर गिर जाती है, दृष्टि नाश हो जाती है, बहरापन बंद जाता है, मुँह से लार टपकती है, वन्धुवर्ग बातोंसे भी सम्मान नहीं करते, स्त्री भी सेवा नहीं करती और पुत्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥१११॥
बुढ़ापे का चित्र ।
मनुष्यका बुढ़ापा सचमुच ही दुःखोंकी खान है। जिस तरह शत्रु बात लगाये रहते हैं और मौका पाते ही हमला करते हैं, वैसे ही रोग जवानीमें तो दवे-छिपे पड़े रहते हैं, पर बुढ़ापेकी अवाई देखते ही प्राणीपर चढ़ बैठते हैं। बुढ़ापेमें शरीर निकम्मा हो जाता है, खाल झूलने लगती है, इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं, आँखोंसे दिखाई नहीं देता, कानोंसे सुनाई नहीं देता, पैरोंसे चला नहीं जाता और दम बढ़ा करता है। हर समय खों-खों लगी रहती है; दाँत अलग ही कष्ट देते और हिल-हिल कर प्राण लेते हैं। कोई कड़ी चीज़ खाई नहीं जाती। ज़रा भी कड़ी चीज़ दाँतों-तले आनेसे दम निकलने लगता है। जिस समय दन्त-पीड़ाके मारे माथा और कनपटी भंजाने लगते हैं, तब मनुष्य मृत्युको याद करने लगता है। दाँतों पर उस्ताद जोड़ने खूब कहा है :—