वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ४४८ )
बुद्धिमत्ता दीखती । क्योंकि अपने बाग़में आप ही वृक्ष लगा कर, आप ही जल सौंच और बड़ाकर, अपने ही हाथोंसे अपने लगाये हुए वृक्षको कोई नहीं काटता । जो ऐसा करता है, वह मूर्ख हो समझा जाता है ।
विधाता की औरभी ग़लतियों ।
—*—
इस सृष्टिकी रचनामें, विधाताने अपनी अनुपम कारीगरी और चातुरीके जो काम किये हैं ; उन्हें देखकर मनुष्यकी अकृदंग रह जाती है । तरह-तरहके फल-फूल और वृक्ष-लता-पत्रादि ; नाना प्रकारके जल, थल और आकाशमें विचरने वाले प्राणी ; अनगिन्ती तारे और सूरज-चन्द्रमा तथा नील गगन प्रभृतिको देखकर रचयिता की रचनाचातुरीकी इंज़ार दिलसे तारीफ़ करने पड़ती है । निस्सन्देह, विधाता की क्षमता और बुद्धिमत्ता, चातुरी और कारीगरीका पार पाना असम्भव है ; तथापि यह कहना पड़ता है कि, उस चतुर कारीगरने भूले भी बहुत की हैं । जिस तरह उसने मनुष्यको, सृष्टिका सर्दार ( Lord of creation ) बनाकर, क्षणभंगुर करनेकी भूलकी है ; उसी तरह उसने सोनेमें सुगन्ध और ईषमें फूल न लगाने तथा चन्द्रमाको कलङ्गी बनानेकी भूले की हैं । किसीने कहा है :—
( ४४६ )
शशनि खलु कलंकः, कण्टकं पदमनाले, युवतिकुचनिपातः, पक्ता केशजाले । जलधिजलमपेयं, पण्डिते निर्धनत्वं, वयसि धनविवेको, निर्विवेको विधाता ॥
चन्द्रमायें कलङ्क, कमलकी डण्डीमें काँटे, युवतियोंकी छतियोंका गिर जाना, बालोंका सफेद हो जाना, समुद्रके जलका पीने योग्य न होना, विद्वानोंका धनहीन रहना और बुढ़ापेमें धनागमकी चिन्ता रहना,—ये सब विधाताकी मूर्खता का परिचय देते हैं ।
कहाँ तक कहें, विधाताने ऐसी-ऐसी अनेक भूलें की हैं । हमने उसकी भूलोंके चन्द्र नमूने यहाँ दिखा दिये हैं । ये सब भूलें मनमें काँटेकी तरह खटकती हैं ; पर इन सबमें भी, मनुष्य जैसे प्राणीका, क्षणभरमें हो, बचूले की तरह विलाप जाना सब से अधिक खटकता है ।
110. How painful is the lack of wisdom of BRAHMA, who creates man as a mine of all the good qualities, a gem among all creatures and the ornament of the universe, yet makes him perishable in a moment !
गान्धं संकुचितं गतिविंगलितं अग्नि च दन्तावलि- दीर्घिन्शयति वर्धते बधिरता वक्त्रं च लालायते ॥
वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुद्धते हा
कण्ठं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुनोऽप्यभिवाप्यते ॥१११॥
२६
( ४५० )
मनुष्यकी बुद्धावस्था बड़ी खेदजनक है। इस अवस्थामें शरीर सुकड़ जाता है, चाल मन्दी पड़ जाती है, दन्त-पंक्ति टूटकर गिर जाती है, दृष्टि नाश हो जाती है, बहरापन बंद जाता है, मुँह से लार टपकती है, वन्धुवर्ग बातोंसे भी सम्मान नहीं करते, स्त्री भी सेवा नहीं करती और पुत्र भी शत्रु हो जाते हैं ॥१११॥
बुढ़ापे का चित्र ।
मनुष्यका बुढ़ापा सचमुच ही दुःखोंकी खान है। जिस तरह शत्रु बात लगाये रहते हैं और मौका पाते ही हमला करते हैं, वैसे ही रोग जवानीमें तो दवे-छिपे पड़े रहते हैं, पर बुढ़ापेकी अवाई देखते ही प्राणीपर चढ़ बैठते हैं। बुढ़ापेमें शरीर निकम्मा हो जाता है, खाल झूलने लगती है, इन्द्रियाँ बेकाम हो जाती हैं, आँखोंसे दिखाई नहीं देता, कानोंसे सुनाई नहीं देता, पैरोंसे चला नहीं जाता और दम बढ़ा करता है। हर समय खों-खों लगी रहती है; दाँत अलग ही कष्ट देते और हिल-हिल कर प्राण लेते हैं। कोई कड़ी चीज़ खाई नहीं जाती। ज़रा भी कड़ी चीज़ दाँतों-तले आनेसे दम निकलने लगता है। जिस समय दन्त-पीड़ाके मारे माथा और कनपटी भंजाने लगते हैं, तब मनुष्य मृत्युको याद करने लगता है। दाँतों पर उस्ताद जोड़ने खूब कहा है :—
A high-contrast black and white photograph showing a close-up of a hand holding the right edge of a book. The page is predominantly white, with a few small, dark specks or imperfections visible near the bottom edge. The book's binding, which appears to be a dark, textured material like cloth or leather, is visible along the right edge. The hand is positioned on the right side of the frame, with fingers gripping the book's edge. The lighting is very bright on the page, creating a stark contrast with the dark background and the hand.
वैराग्यशक्त ॥ ६ ॥
पुत्र स्त्री
— J. Banerjee —
संतुण की बुद्धावस्था बड़ी ख़तरनाक है। शरीर काम नहीं देता, स्त्रो सेवा नहीं करती—देखते ही आँखें निकालती है। पुत्र भी गजू हो जाते हैं।
( ४५१ )
जिन दाँतोसे हँसते थे हमेशा, खिल-खिल ।
अब दर्दसे हैं वही रलाते, हिल-हिल ॥
पीरीमें कहाँ, अब वह जवानीके मज़े ।
ए जौक, बुढ़ापेसे है दाँता-किल-किल ॥
जिन दाँतोसे जवानीमें खिल-खिला खिल-खिलाकर हँसा करते थे, अब बुढ़ापेमें वही हिल-हिल कर हमें रलाते हैं ! ऐ जौक ! बुढ़ापे में अब वह जवानीके मज़े कहाँ हैं ? अब तो इस बुढ़ापे से दाँता-किल-किल है !
महाकवि नज़ीर अकबराबादी “बुढ़ापे” का क्या ही अच्छा चित्र खींचते हैं :—
बुढ़ापा ।
क्या कुहर है यारो, जिसे आ जाय बुढ़ापा ।
और ऐश जवानीके तर्ह, खाय बुढ़ापा ॥
इशरतको मिला खाकमें, गुम लाय बुढ़ापा ।
हर कामको हर बातको, तरसाय बुढ़ापा ॥
सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा ।
आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥१॥
आगे तो परीज़ाद ये, रखते थे हमें घेर ।
आते थे चले आप, जो लगती थी ज़रा देर ॥
( ४५२ )
सो आके बुढ़ापेने किया, हाथ ये अन्धेर । जो दौड़के मिलते थे, वो अब लेते हैं मुँह फेर ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥२॥ क्या यारो, उलट हाथ गया हमसे जमाना । जो शोख कि थे, अपनी निगाहोंके निशाना ॥ डेढ़ है कोई डालके, दादाका बहाना । हँस कर कोई कहता है, कहाँ जाते हो नाना ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥३॥ पूछें जिसे कहता है, वो क्या पूछे है बुढ़ा । आँवे तो ये गुल-शोर ; कहाँ आवे है बुढ़ा ॥ बैठ तो ये है धूम, कहाँ बैठ है बुढ़ा ॥ देखें जिसे वह कहता है, क्या देखे है बुढ़ा ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥४॥ वह जोश नहीं, जिसके कोई खौफ़से दहले । वह जोम नहीं, जिससे कोई बातको सहले ॥ जब फस डूए हाथ, थके पाँव भी पहिले । फिर जिसके जो कुछ शौक में आवे, सोई कहले ॥
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बमुझि जलहौन सरोवर को और भारै कमल-हीन तालाब को खाना रहे है ।
( पृष्ठ ४०० )
वैराग्यशालक
वैराग्यशतक ~~~~~ ६
सभी स्वार्थ के सगे हैं। स्वार्थ बिना कोई किसी का नहीं। देखिये, फख्हीन वृक्षको पत्ती और जले हुए अंगल को हिरन त्याग रहे हैं। पृ० ४०० (शेष पुरतपर देखिये।)
( ४५३ )
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥५॥
करते थे जवानीमें, तो सब आपसे आ चाह । और हुस्न दिखाते थे, वह सब आनके दिलच्छाह।
यह कहर बुढ़ापेने किया, आह नजीर आह ! अब कोई नहीं पूछता, अल्लाह ही अल्लाह ॥
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥
बुढ़ापे में निर्धनता मरण है !
—००५०५००—
यदि मनुष्य जवानोंमें प्रचुर धन कमाकर रख देता है, तब तो बुढ़ापा सुखसे पार हो जाता है ; घरवाले हलवा और मोहन-मोग खिलाते, गरमागरम दूध पिलाते अथवा कोई और सुखसे खाये जाने-योग्य पदार्थ बना देते हैं ; यदि पास पैसा नहीं होता, तो सभी घरवाले हर तरहसे अनादर करते और सूखे टुकड़े सामने रखते हैं ; इच्छा हो बूढ़ा खाय, इच्छा हो न खाय । अगर बूढ़ेके पास धन होता है, तो खी, पुत्र, पौत्र और पुत्री तथा पुत्र-बहुएँ हर समय बूढ़ेकी हाज़िरीमें खड़े रहते हैं ; मुँहसे बात नहीं निकलती और काम हो जाता है । अगर बूढ़ेके पास धन नहीं होता, तो सब उसे त्याग देते हैं ;
( ४५४ )
क्योंकि यह संसार मतलबका है ; बिना स्वार्थ, बिना मतलब और बिना पैसे कोई बात नहीं करता । मतलबसे ही लोग एक दूसरेके नातेदार और सम्बन्धी बने हुए हैं ; वास्तवमें , कोई किसीका नहीं है ।
कहा है :—
वृत्तं जीणफलं त्यजन्ति विहगाः, शुष्कसरः सारसाः । पुण्यं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपा, दग्धं वनान्तं मृगाः ॥ निर्दुःखं पुरुषं त्यजन्ति गणिकाः मृष्टिश्रयं मन्त्रिणः । सर्वः कार्यवशाद् जनोऽभिरसते, कस्यास्तिनो वल्लभः ? ॥
फलहीन वृक्षको पक्षी त्याग देते हैं, सूखे तालाबको सारस छोड़ देते हैं, मधुहीन फूलोंको भौरै त्याग देते हैं, जले हुए वनको हिस्त्र छोड़ देते हैं, धनहीन पुरुषको वेश्या त्याग देती है और श्रीहीन राजाको मन्त्री त्याग देते हैं । सब मतलबसे एक दूसरेको चाहते हैं ; नहीं तो कौन किसका प्यारा है ?
“मोहमुद्गर” में लिखा है :—
यावद् वित्तोपार्जनशक्तः, तावत् निज परिवारो रक्तः । तदनु च जया जर्जर देहे, वात्तां कौडपि न प्रच्छति गेहे ॥
जब तक धन कमाने की सामर्थ्य रहती है, तब तक कुटुम्ब के लीग राजी रहते हैं ; इसके बाद, बुढ़ापे से शरीर जर्जर होते ही, कोई बात तक नहीं पूछता ।
( ४५५ )
संसारकी यही धारा है। जिस पुत्रके लिये बचपनमें कहीं से धन लाते और उसे अच्छा पिलाते-बिलाते और पहनाते थे, हर तरह लाड़-प्यार करते थे; पास पैसा न होनेपर भी, पढ़ाने-लिखाने में अपनी शक्ति से अधिक खर्च करते थे; आप तंगी भोगते थे, पर पुत्रको तंगदस्त न होने देते थे; आप फटे कपड़े पहने फिरते थे; पर उसे अच्छे-अच्छा-पहनाते थे; अब वही पुत्र मुँहसे नहीं बोलता, मौका पड़नेसे वह या उसके पुत्र गालियाँ देते और कभी-कभी बूढ़ेको मार तक बैठते हैं; पुत्र-बधुयें दिन-भर तनतनाया करती और कहती हैं,—“ससुरजी मरें तो संकट कटे; दिन-भर पड़े-पड़े खाते और थूक-थूक कर घर खराब करते हैं; हमसे तो रोजकी रोज मेला साफ नहीं होता।” बेटोंकी बहुएँ तो बहुएँ, खास अपनी अर्द्धाङ्गी देखते ही आँखें बड़ा लेती और खाँड-खाँड करती रहती है; बूढ़े पत्रिको आलिङ्गन करजा, उसकी सेवा करना तो दूरकी बात है, उसे पास बैठाना भी बुरा समझती है। बीमारोंमें सेवा-शुश्रूषा करती-करती कहने लगती है—“अब तो तुम मर जाओ तो अच्छा हो। मुझसे यह सब अब नहीं होता।” कहाँ तक गिनाव, बुढ़ापेमें ऐसे-ऐसे अनगित्तो दुःख आ घेरते हैं; पर आश्चर्य्य तो यह है कि, इतने पर भी, अज्ञानियोंका मोह नहीं छूटता। हमें एक मोहान्ध बूढ़ेकी कहानी याद आई है, उससे पाठकों को बहुत कुछ ज्ञान होगा—उनकी आँखें खुल जायगी:—
( ४५६ )
एक बूढ़े सेठ की दुर्दशा ।
किसी नगरमें एक बूढ़ा सेठ रहता था । उसने जवानोंमें बहुतसा धन सञ्चय किया था । बुढ़ापेमें, पुत्रोंने उससे सारा धन अपने हाथोंमें ले लिया । बूढ़ेको पौलीमें, एक रूटी सी चार-पाई पर, एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछाकर पटक दिया । एक लाठी उसके हाथमें दे दी और कह दिया कि, घरमें चोर-चकाँर या कुत्ता-बिल्ली न आने पावे । सब घरके भोजन कर लेने पर, बच्चा-खुच्चा-खाना एक फूटीसी थालीमें रखकर बहुधा बूढ़ेको दे जाती । कुछ दिन इसतरह गुजरे । पुत्र-बधुओंको यह भी अच्छा न लगा । उन्होंने कहा—“ससुरजीके कारण निकलने-बेठनेमें बार-बार धूँघट करना होता है, इससे बड़ा कष्ट होता है । अच्छा हो यदि ये ऊपरके चौबारेमें रख दिये जायँ और एक घण्टी इन्हें दे दी जाय । जब इन्हें किसी चीजकी ज़रूरत होगी, यह घण्टी बजा देंगे ।” कलियुगमें जोरुका हुकम खुदाके हुकमके बराबर समझा जाता है । बेठोंने अपनी घरवालिथोंकी बात मंज़ूर कर ली और कह-सुन कर बूढ़ेको ऊपर पहुँचा दिया और एक घण्टी उसे दे दी । बूढ़ेको जब खाना या पानी वगैरः की ज़रूरत होती, घण्टी बजा देता । कुछ दिनों बाद, एक दिन, बूढ़ेका नाती ऊपर चला गया । बूढ़ा उसे खिलाता रहा । शेषमें, वह खेलता-खेलता घण्टी ले आया । अब तो मुश्किल हो गई ; बूढ़ा खाने-पीने बिना मर गया । २४ घण्टे बीतने
( ४५७ )
पर किसीको उसकी याद आई। देखा, तो बूढ़ेराम कुछ कर गये थे। पुत्रोंने उसे श्मशान पर लेजाकर जला दिया। बुढ़ापेमें ऐसी ही दुर्गति होती है।
बुढ़ापेमें ममता और भी बढ़ जाती है।
एक बूढ़ा अपने मकानको पौलोंमें पड़ा रहता था। कोई उसकी बात न पूछता था। बेचारा ज्यों त्यों करके दिन काटता था। एक दिन उसका पोता उसे मारने और गाली देने लगा। बूढ़ा भी उसे गाली देने लगा। इतनेमें नारदजी उधरसे आ निकले। उन्होंने बूढ़ेसे सारा हाल पूछा। उसकी दुर्दशाका हाल सुनकर, नारद जीने उससे कहा—“तुम्हारा जीवन चूथा है। तुम या तो बनमें जाकर तप करो या हमारे साथ स्वर्गको चलो।” सुनते ही बूढ़ा लाल हो गया और बोला—“महाराज! अपनी राह लीजिये। मेरे नाती-बेटे मुझे मारे चाहें गाली दें, आप क्राज़ी या मुल्ला? मैं इन्होंने खुश हूँ।” नारदजी संसारकी मोह-ममता देखकर दक्कू रह गये। बात यह है कि, अज्ञानी लोगों की तृष्णा और ममता बुढ़ापेमें औरभी बढ़ जाती है। वे हज़ारों तरहके कष्ट सहते और अपमानित होते हैं; पर गृहस्थाश्रमको नहीं त्यागते। इसी मिथ्या और स्वार्थपर संसारकी हाय-हायमें एक दिन मर जाते और ममताके कारण
( ४५८ )
बार-बार जन्म लेते और मरते हैं। इस तरह उनके जन्म-मरणका चक्र घूमा ही करता है।
मोह त्यागने में ही भलाई है।
मोह-ममता ही संसार-बन्धनका कारण है। ज्ञानी समझते हैं कि, यहाँ कोई किसीका नहीं है। सभी सराय के मुसाफिर हैं। राह चलते-चलते एक जगह एकत्र हो गये हैं। अपना-अपना समय होने पर, अपनी-अपनी राह ठगते हैं। न कोई किसीकी स्त्री है और न कोई किसीका पति है ; न कोई किसीका पुत्र है और न पिता ; न कोई किसीका भतीजा है और न चाचा प्रभृति। स्वार्थकी ज़ंजीरमें सब बँधे हुए हैं। फिर इन स्थायियोंका साथ भी सदा-सर्वदाको नहीं। आज साथ हैं, तो कल अलग हो जायेंगे। जन्मके सप्थ मृत्यु निश्चित है और संयोगके साथ वियोग अटल है। जब पुरुषका खीसे वियोग होता है, तब उसको बड़ा कष्ट और शोक होता है। इसी तरह पुत्रके मरने पर भी महा शोक होता है। पर जो ज्ञानी हैं, तत्त्ववेत्ता हैं, वे इस जगत्के नातोंको असलियतको जानते हैं ; अतः, या तो वे गृहस्थीको तज देते हैं या कुटुम्बियोंमें रहते हुए भी उनमें मोह-ममता नहीं रखते। जो परिवारमें रहते हुए भी, परिवारमें मोह-ममता नहीं रखते, वे जीवन्मुक्त हैं। धन्य है ऐसे नरख !
( ४५६ )
एक निर्माही राजाकी कहानी सुनने और ध्यान देने योग्य है—
निर्माही राजा ।
—○—○—○—
किसी नगरमें एक ज्ञानी राजा था। उसे सब निर्माही कहते थे। एक दिन उसका राजकुमार बनमें शिकार खेलने गया। उसे प्यास लगेर खे लगी। पानीकी खोजमें, वह एक मुनिके आश्रममें जा पहुँचा। मुनिने उसे जल पिलाया और पूछा—“आप किसके पुत्र हैं?” लड़केने कहा—“मैं निर्माही राजाका पुत्र हूँ।” महात्माने कहा—“राजकुमार ! एक ही मनुष्य निर्माही भी हो और साथ ही राजा भी हो, यह नितान्त असम्भव है। जो राजा होगा, वह निर्माही न होगा और जो निर्माही होगा, वह राजा न होगा।” राजकुमार ने कहा—“यदि आपको विश्वास नहीं आता; तो आप जाकर परीक्षा कर लीजिये।” मुनिने कहा—“अच्छा, हम नगरमें जाते हैं। जबतक हम न लौटें; तबतक आप यहीं ठहरे।” यह कहकर मुनि महाराज नगर को चले गये और राजभवनके द्वार पर जा पहुँचे। द्वार पर उन्हें एक दासी खड़ी मिली।
मुनिने दासी से कहा:—
॥ दोहा ॥
तू सुन चैरी रथामकी, बात सुनावौं तोहि ।
कुंवर विनास्यौं सिंहने, आसन पर्यौं मोहि ॥
( ४६० )
दासीने जवाब दिया :—
॥ दोहा ॥
ना मैं चेरी श्यामकी, नहि कोई मेरो श्याम । प्रारब्धवश मेल यह, सुनो ऋषी अभिराम ॥
इसके बाद ऋषि आगे चले, तो उन्हें राजकुमार की खी मिली । उससे उन्होंने कहा :—
॥ दोहा ॥
तू सुन चातुर सुन्दरी, अबला यौवनवान् । देवीवाहन दलमल्यौ, तुम्हरो श्रीभगवान् ॥
खी ने जवाब दिया ।
॥ दोहा ॥
तपिया पूरब जनम की, क्या जानत है लोक । मिले कर्मवश आन हम, अब विधि कीन वियोग ॥
इसके बाद ऋषिने राजकुमारकी मातासे मिलना चाहा । वे रानीके पास जा पहुँचे और उससे मिलकर उन्होंने कहा :—
॥ दोहा ॥
रानी तुमको विपति अति, सुत खायो मृगराज । हमने भोजन ना किया, तिसी मृतकके काज ॥
( ४६१ )
रानीने जवाब दिया :—
॥ दोहा ॥
एक वृक्ष डालें घनी, पंखी बैठे आय ।
यह पाटी पीरी भई, उड़ उड़ चहूँ दिशि जायँ ॥
इसके बाद ऋषि राज-दरबारमें गये और राजासे मिले । कुशल-प्रश्न होनेके बाद, ऋषिने कहा :—
॥ दोहा ॥
राजा सुखतें राम कहू, पल-पल जात खड़ी ।
सुत खायो मृगराजने, मेरे पास खड़ी ॥
राजा ने जवाब दिया ।
॥ दोहा ॥
तपिया तप क्यों छँडियो, इहों पलक नहि सोग ।
वासा जगत सरायका, सभी सुसाफिर लोग ॥
राजाका जवाब सुनते ही ऋषि को विश्वास हो गया कि, राजा ही नहीं, राजा और राजाका सारा कुटुम्ब निर्मोही हैं ।
मनुष्यको प्रथम तो गृहस्थाश्रम में रहना ही नहीं चाहिये और यदि रहे भी, तो निर्मोही राजाकी तरह मोह त्याग-कर रहे । ममता त्याग कर गृहस्थी में रहनेसे, मनुष्य भवबन्धन में नहीं बँधता और संसार के दुःख-कलेश उसे सन्तत नहीं कर सकते । ऐसे ज्ञानीको जीवनमुक्त कहते हैं ।
( ४६२ )
पर हम देखते हैं कि, बुढ़ापे में मनुष्य की आशा-उष्णा और भी बढ़ जाती है। बूढ़ा रात-दिन अपने बेटे-पोतों और दोहितोंकी चिन्ता में ही मग्न रहता है। आप मरनेके किनारे बैठा रहता है, तोभों पुत्र-पौत्रों के लिये धन की चिन्ता किया करता है। उसे कम-से-कम इस चला-चली की अवस्था में तो परमात्मा का भजन करना चाहिये; पर वृद्धसे यह नहीं होता। शङ्कराचार्ये कृत “मोहमुद्गर” में लिखा है :—
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुण्यीरक्तः ।
वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः, परमे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥
बचपन में मनुष्य खेल-कूद में लगा रहता है, जवानी में युवती स्त्री में आसक्त रहता है और बुढ़ापे में चिन्ता फिकों में डूबा रहता है; लेकिन परम ब्रह्म की चिन्तना में कोई नहीं लगा रहता।
शोक चिन्ता करना वृथा है ।
यह संसार मिथ्या और नाशमान् है। यहाँ कोई किसीका नहीं। फिर वृथा शोक-फिकमें अपनी दुर्लभ मनुष्य-देहको नाश करना और जिस काम के लिये जगत् में आये हैं, उस काम की ओर ध्यान न देना, सबमुच ही भारी नादानी है। पुत्र मर गया तो क्या? स्त्री मर गयी तो क्या? धन चला गया तो क्या? जिस तरह पुत्र-स्त्री या मित्र-यार प्रभृति चले गये, मर
( ४६३ )
गाये ; उसी तरह हम भी एक दिन मर जायेंगे ; फिर शोच किसका ? यदि वे चले जाते और हम सदा बने रहते ; तोभी शोच कर सकते थे ; पर जब सभी को जाना है, तब कौन किसका शोच करे ? कहा है—
अष्टकुलाचलसप्तसमुद्राः ब्रह्म-पुरन्दर-दिनकर-रुद्राः ।
न त्वं, नाहं, नायं लोकः, तदपि किमर्थं क्रियते शोकः ॥
हिमालय और विन्ध्याचल प्रभृति आठ पर्वत, सातों समुन्दर, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और रुद्र सभी अनित्य और नाशमान हैं। न तू, न मैं और न यह लोक स्थायी है ; तो फिर शोक किस लिये किया जाता है ?
मृत्युसे डरने और ध्वराने की जरूरत नहीं ।
जबतक मनुष्यको शरीर और शरीरी अथवा देह और आत्माके अलग-अलग होनेका ज्ञान नहीं होता, जबतक वह इस बातको नहीं समझता कि, आत्मा अमर, अविनाशी, नित्य और शाश्वत है ; वह कभी नहीं मरता, उसे जल डुबा नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, हवा सोख नहीं सकती, तैल-वार बन्दूक प्रभृति मार नहीं सकती, तभी तक वह डरता और ध्वरता है। यह शरीर नाश होता है, आत्मा नहीं ; मरना, एक कपड़ा उतारकर दूसरा पहनना है ; शरीर आत्माके