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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पर हम देखते हैं कि, बुढ़ापे में मनुष्य की आशा-उष्णा और भी बढ़ जाती है। बूढ़ा रात-दिन अपने बेटे-पोतों और दोहितोंकी चिन्ता में ही मग्न रहता है। आप मरनेके किनारे बैठा रहता है, तोभों पुत्र-पौत्रों के लिये धन की चिन्ता किया करता है। उसे कम-से-कम इस चला-चली की अवस्था में तो परमात्मा का भजन करना चाहिये; पर वृद्धसे यह नहीं होता। शङ्कराचार्ये कृत “मोहमुद्गर” में लिखा है :—

बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुण्यीरक्तः ।

वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः, परमे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥

बचपन में मनुष्य खेल-कूद में लगा रहता है, जवानी में युवती स्त्री में आसक्त रहता है और बुढ़ापे में चिन्ता फिकों में डूबा रहता है; लेकिन परम ब्रह्म की चिन्तना में कोई नहीं लगा रहता।

शोक चिन्ता करना वृथा है ।

यह संसार मिथ्या और नाशमान् है। यहाँ कोई किसीका नहीं। फिर वृथा शोक-फिकमें अपनी दुर्लभ मनुष्य-देहको नाश करना और जिस काम के लिये जगत् में आये हैं, उस काम की ओर ध्यान न देना, सबमुच ही भारी नादानी है। पुत्र मर गया तो क्या? स्त्री मर गयी तो क्या? धन चला गया तो क्या? जिस तरह पुत्र-स्त्री या मित्र-यार प्रभृति चले गये, मर