वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 579, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४६१ )
रानीने जवाब दिया :—
॥ दोहा ॥
एक वृक्ष डालें घनी, पंखी बैठे आय ।
यह पाटी पीरी भई, उड़ उड़ चहूँ दिशि जायँ ॥
इसके बाद ऋषि राज-दरबारमें गये और राजासे मिले । कुशल-प्रश्न होनेके बाद, ऋषिने कहा :—
॥ दोहा ॥
राजा सुखतें राम कहू, पल-पल जात खड़ी ।
सुत खायो मृगराजने, मेरे पास खड़ी ॥
राजा ने जवाब दिया ।
॥ दोहा ॥
तपिया तप क्यों छँडियो, इहों पलक नहि सोग ।
वासा जगत सरायका, सभी सुसाफिर लोग ॥
राजाका जवाब सुनते ही ऋषि को विश्वास हो गया कि, राजा ही नहीं, राजा और राजाका सारा कुटुम्ब निर्मोही हैं ।
मनुष्यको प्रथम तो गृहस्थाश्रम में रहना ही नहीं चाहिये और यदि रहे भी, तो निर्मोही राजाकी तरह मोह त्याग-कर रहे । ममता त्याग कर गृहस्थी में रहनेसे, मनुष्य भवबन्धन में नहीं बँधता और संसार के दुःख-कलेश उसे सन्तत नहीं कर सकते । ऐसे ज्ञानीको जीवनमुक्त कहते हैं ।