वैराग्य शतक

वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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( ४६० )
दासीने जवाब दिया :—
॥ दोहा ॥
ना मैं चेरी श्यामकी, नहि कोई मेरो श्याम । प्रारब्धवश मेल यह, सुनो ऋषी अभिराम ॥
इसके बाद ऋषि आगे चले, तो उन्हें राजकुमार की खी मिली । उससे उन्होंने कहा :—
॥ दोहा ॥
तू सुन चातुर सुन्दरी, अबला यौवनवान् । देवीवाहन दलमल्यौ, तुम्हरो श्रीभगवान् ॥
खी ने जवाब दिया ।
॥ दोहा ॥
तपिया पूरब जनम की, क्या जानत है लोक । मिले कर्मवश आन हम, अब विधि कीन वियोग ॥
इसके बाद ऋषिने राजकुमारकी मातासे मिलना चाहा । वे रानीके पास जा पहुँचे और उससे मिलकर उन्होंने कहा :—
॥ दोहा ॥
रानी तुमको विपति अति, सुत खायो मृगराज । हमने भोजन ना किया, तिसी मृतकके काज ॥