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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 577

( ४५६ )

एक निर्माही राजाकी कहानी सुनने और ध्यान देने योग्य है—

निर्माही राजा ।

—○—○—○—

किसी नगरमें एक ज्ञानी राजा था। उसे सब निर्माही कहते थे। एक दिन उसका राजकुमार बनमें शिकार खेलने गया। उसे प्यास लगेर खे लगी। पानीकी खोजमें, वह एक मुनिके आश्रममें जा पहुँचा। मुनिने उसे जल पिलाया और पूछा—“आप किसके पुत्र हैं?” लड़केने कहा—“मैं निर्माही राजाका पुत्र हूँ।” महात्माने कहा—“राजकुमार ! एक ही मनुष्य निर्माही भी हो और साथ ही राजा भी हो, यह नितान्त असम्भव है। जो राजा होगा, वह निर्माही न होगा और जो निर्माही होगा, वह राजा न होगा।” राजकुमार ने कहा—“यदि आपको विश्वास नहीं आता; तो आप जाकर परीक्षा कर लीजिये।” मुनिने कहा—“अच्छा, हम नगरमें जाते हैं। जबतक हम न लौटें; तबतक आप यहीं ठहरे।” यह कहकर मुनि महाराज नगर को चले गये और राजभवनके द्वार पर जा पहुँचे। द्वार पर उन्हें एक दासी खड़ी मिली।

मुनिने दासी से कहा:—

॥ दोहा ॥

तू सुन चैरी रथामकी, बात सुनावौं तोहि ।

कुंवर विनास्यौं सिंहने, आसन पर्यौं मोहि ॥