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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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सो आके बुढ़ापेने किया, हाथ ये अन्धेर । जो दौड़के मिलते थे, वो अब लेते हैं मुँह फेर ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥२॥ क्या यारो, उलट हाथ गया हमसे जमाना । जो शोख कि थे, अपनी निगाहोंके निशाना ॥ डेढ़ है कोई डालके, दादाका बहाना । हँस कर कोई कहता है, कहाँ जाते हो नाना ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥३॥ पूछें जिसे कहता है, वो क्या पूछे है बुढ़ा । आँवे तो ये गुल-शोर ; कहाँ आवे है बुढ़ा ॥ बैठ तो ये है धूम, कहाँ बैठ है बुढ़ा ॥ देखें जिसे वह कहता है, क्या देखे है बुढ़ा ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥४॥ वह जोश नहीं, जिसके कोई खौफ़से दहले । वह जोम नहीं, जिससे कोई बातको सहले ॥ जब फस डूए हाथ, थके पाँव भी पहिले । फिर जिसके जो कुछ शौक में आवे, सोई कहले ॥

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बमुझि जलहौन सरोवर को और भारै कमल-हीन तालाब को खाना रहे है ।

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