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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४५१ )

जिन दाँतोसे हँसते थे हमेशा, खिल-खिल ।

अब दर्दसे हैं वही रलाते, हिल-हिल ॥

पीरीमें कहाँ, अब वह जवानीके मज़े ।

ए जौक, बुढ़ापेसे है दाँता-किल-किल ॥

जिन दाँतोसे जवानीमें खिल-खिला खिल-खिलाकर हँसा करते थे, अब बुढ़ापेमें वही हिल-हिल कर हमें रलाते हैं ! ऐ जौक ! बुढ़ापे में अब वह जवानीके मज़े कहाँ हैं ? अब तो इस बुढ़ापे से दाँता-किल-किल है !

महाकवि नज़ीर अकबराबादी “बुढ़ापे” का क्या ही अच्छा चित्र खींचते हैं :—

बुढ़ापा ।

क्या कुहर है यारो, जिसे आ जाय बुढ़ापा ।

और ऐश जवानीके तर्ह, खाय बुढ़ापा ॥

इशरतको मिला खाकमें, गुम लाय बुढ़ापा ।

हर कामको हर बातको, तरसाय बुढ़ापा ॥

सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा ।

आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥१॥

आगे तो परीज़ाद ये, रखते थे हमें घेर ।

आते थे चले आप, जो लगती थी ज़रा देर ॥