वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( ४५२ )
सो आके बुढ़ापेने किया, हाथ ये अन्धेर । जो दौड़के मिलते थे, वो अब लेते हैं मुँह फेर ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥२॥ क्या यारो, उलट हाथ गया हमसे जमाना । जो शोख कि थे, अपनी निगाहोंके निशाना ॥ डेढ़ है कोई डालके, दादाका बहाना । हँस कर कोई कहता है, कहाँ जाते हो नाना ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥३॥ पूछें जिसे कहता है, वो क्या पूछे है बुढ़ा । आँवे तो ये गुल-शोर ; कहाँ आवे है बुढ़ा ॥ बैठ तो ये है धूम, कहाँ बैठ है बुढ़ा ॥ देखें जिसे वह कहता है, क्या देखे है बुढ़ा ॥ सब चीज़को होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥४॥ वह जोश नहीं, जिसके कोई खौफ़से दहले । वह जोम नहीं, जिससे कोई बातको सहले ॥ जब फस डूए हाथ, थके पाँव भी पहिले । फिर जिसके जो कुछ शौक में आवे, सोई कहले ॥
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बमुझि जलहौन सरोवर को और भारै कमल-हीन तालाब को खाना रहे है ।
( पृष्ठ ४०० )
वैराग्यशालक
वैराग्यशतक ~~~~~ ६
सभी स्वार्थ के सगे हैं। स्वार्थ बिना कोई किसी का नहीं। देखिये, फख्हीन वृक्षको पत्ती और जले हुए अंगल को हिरन त्याग रहे हैं। पृ० ४०० (शेष पुरतपर देखिये।)
( ४५३ )
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥५॥
करते थे जवानीमें, तो सब आपसे आ चाह । और हुस्न दिखाते थे, वह सब आनके दिलच्छाह।
यह कहर बुढ़ापेने किया, आह नजीर आह ! अब कोई नहीं पूछता, अल्लाह ही अल्लाह ॥
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥
बुढ़ापे में निर्धनता मरण है !
—००५०५००—
यदि मनुष्य जवानोंमें प्रचुर धन कमाकर रख देता है, तब तो बुढ़ापा सुखसे पार हो जाता है ; घरवाले हलवा और मोहन-मोग खिलाते, गरमागरम दूध पिलाते अथवा कोई और सुखसे खाये जाने-योग्य पदार्थ बना देते हैं ; यदि पास पैसा नहीं होता, तो सभी घरवाले हर तरहसे अनादर करते और सूखे टुकड़े सामने रखते हैं ; इच्छा हो बूढ़ा खाय, इच्छा हो न खाय । अगर बूढ़ेके पास धन होता है, तो खी, पुत्र, पौत्र और पुत्री तथा पुत्र-बहुएँ हर समय बूढ़ेकी हाज़िरीमें खड़े रहते हैं ; मुँहसे बात नहीं निकलती और काम हो जाता है । अगर बूढ़ेके पास धन नहीं होता, तो सब उसे त्याग देते हैं ;
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क्योंकि यह संसार मतलबका है ; बिना स्वार्थ, बिना मतलब और बिना पैसे कोई बात नहीं करता । मतलबसे ही लोग एक दूसरेके नातेदार और सम्बन्धी बने हुए हैं ; वास्तवमें , कोई किसीका नहीं है ।
कहा है :—
वृत्तं जीणफलं त्यजन्ति विहगाः, शुष्कसरः सारसाः । पुण्यं पर्युषितं त्यजन्ति मधुपा, दग्धं वनान्तं मृगाः ॥ निर्दुःखं पुरुषं त्यजन्ति गणिकाः मृष्टिश्रयं मन्त्रिणः । सर्वः कार्यवशाद् जनोऽभिरसते, कस्यास्तिनो वल्लभः ? ॥
फलहीन वृक्षको पक्षी त्याग देते हैं, सूखे तालाबको सारस छोड़ देते हैं, मधुहीन फूलोंको भौरै त्याग देते हैं, जले हुए वनको हिस्त्र छोड़ देते हैं, धनहीन पुरुषको वेश्या त्याग देती है और श्रीहीन राजाको मन्त्री त्याग देते हैं । सब मतलबसे एक दूसरेको चाहते हैं ; नहीं तो कौन किसका प्यारा है ?
“मोहमुद्गर” में लिखा है :—
यावद् वित्तोपार्जनशक्तः, तावत् निज परिवारो रक्तः । तदनु च जया जर्जर देहे, वात्तां कौडपि न प्रच्छति गेहे ॥
जब तक धन कमाने की सामर्थ्य रहती है, तब तक कुटुम्ब के लीग राजी रहते हैं ; इसके बाद, बुढ़ापे से शरीर जर्जर होते ही, कोई बात तक नहीं पूछता ।
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संसारकी यही धारा है। जिस पुत्रके लिये बचपनमें कहीं से धन लाते और उसे अच्छा पिलाते-बिलाते और पहनाते थे, हर तरह लाड़-प्यार करते थे; पास पैसा न होनेपर भी, पढ़ाने-लिखाने में अपनी शक्ति से अधिक खर्च करते थे; आप तंगी भोगते थे, पर पुत्रको तंगदस्त न होने देते थे; आप फटे कपड़े पहने फिरते थे; पर उसे अच्छे-अच्छा-पहनाते थे; अब वही पुत्र मुँहसे नहीं बोलता, मौका पड़नेसे वह या उसके पुत्र गालियाँ देते और कभी-कभी बूढ़ेको मार तक बैठते हैं; पुत्र-बधुयें दिन-भर तनतनाया करती और कहती हैं,—“ससुरजी मरें तो संकट कटे; दिन-भर पड़े-पड़े खाते और थूक-थूक कर घर खराब करते हैं; हमसे तो रोजकी रोज मेला साफ नहीं होता।” बेटोंकी बहुएँ तो बहुएँ, खास अपनी अर्द्धाङ्गी देखते ही आँखें बड़ा लेती और खाँड-खाँड करती रहती है; बूढ़े पत्रिको आलिङ्गन करजा, उसकी सेवा करना तो दूरकी बात है, उसे पास बैठाना भी बुरा समझती है। बीमारोंमें सेवा-शुश्रूषा करती-करती कहने लगती है—“अब तो तुम मर जाओ तो अच्छा हो। मुझसे यह सब अब नहीं होता।” कहाँ तक गिनाव, बुढ़ापेमें ऐसे-ऐसे अनगित्तो दुःख आ घेरते हैं; पर आश्चर्य्य तो यह है कि, इतने पर भी, अज्ञानियोंका मोह नहीं छूटता। हमें एक मोहान्ध बूढ़ेकी कहानी याद आई है, उससे पाठकों को बहुत कुछ ज्ञान होगा—उनकी आँखें खुल जायगी:—
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एक बूढ़े सेठ की दुर्दशा ।
किसी नगरमें एक बूढ़ा सेठ रहता था । उसने जवानोंमें बहुतसा धन सञ्चय किया था । बुढ़ापेमें, पुत्रोंने उससे सारा धन अपने हाथोंमें ले लिया । बूढ़ेको पौलीमें, एक रूटी सी चार-पाई पर, एक फटी-पुरानी गुदड़ी बिछाकर पटक दिया । एक लाठी उसके हाथमें दे दी और कह दिया कि, घरमें चोर-चकाँर या कुत्ता-बिल्ली न आने पावे । सब घरके भोजन कर लेने पर, बच्चा-खुच्चा-खाना एक फूटीसी थालीमें रखकर बहुधा बूढ़ेको दे जाती । कुछ दिन इसतरह गुजरे । पुत्र-बधुओंको यह भी अच्छा न लगा । उन्होंने कहा—“ससुरजीके कारण निकलने-बेठनेमें बार-बार धूँघट करना होता है, इससे बड़ा कष्ट होता है । अच्छा हो यदि ये ऊपरके चौबारेमें रख दिये जायँ और एक घण्टी इन्हें दे दी जाय । जब इन्हें किसी चीजकी ज़रूरत होगी, यह घण्टी बजा देंगे ।” कलियुगमें जोरुका हुकम खुदाके हुकमके बराबर समझा जाता है । बेठोंने अपनी घरवालिथोंकी बात मंज़ूर कर ली और कह-सुन कर बूढ़ेको ऊपर पहुँचा दिया और एक घण्टी उसे दे दी । बूढ़ेको जब खाना या पानी वगैरः की ज़रूरत होती, घण्टी बजा देता । कुछ दिनों बाद, एक दिन, बूढ़ेका नाती ऊपर चला गया । बूढ़ा उसे खिलाता रहा । शेषमें, वह खेलता-खेलता घण्टी ले आया । अब तो मुश्किल हो गई ; बूढ़ा खाने-पीने बिना मर गया । २४ घण्टे बीतने
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पर किसीको उसकी याद आई। देखा, तो बूढ़ेराम कुछ कर गये थे। पुत्रोंने उसे श्मशान पर लेजाकर जला दिया। बुढ़ापेमें ऐसी ही दुर्गति होती है।
बुढ़ापेमें ममता और भी बढ़ जाती है।
एक बूढ़ा अपने मकानको पौलोंमें पड़ा रहता था। कोई उसकी बात न पूछता था। बेचारा ज्यों त्यों करके दिन काटता था। एक दिन उसका पोता उसे मारने और गाली देने लगा। बूढ़ा भी उसे गाली देने लगा। इतनेमें नारदजी उधरसे आ निकले। उन्होंने बूढ़ेसे सारा हाल पूछा। उसकी दुर्दशाका हाल सुनकर, नारद जीने उससे कहा—“तुम्हारा जीवन चूथा है। तुम या तो बनमें जाकर तप करो या हमारे साथ स्वर्गको चलो।” सुनते ही बूढ़ा लाल हो गया और बोला—“महाराज! अपनी राह लीजिये। मेरे नाती-बेटे मुझे मारे चाहें गाली दें, आप क्राज़ी या मुल्ला? मैं इन्होंने खुश हूँ।” नारदजी संसारकी मोह-ममता देखकर दक्कू रह गये। बात यह है कि, अज्ञानी लोगों की तृष्णा और ममता बुढ़ापेमें औरभी बढ़ जाती है। वे हज़ारों तरहके कष्ट सहते और अपमानित होते हैं; पर गृहस्थाश्रमको नहीं त्यागते। इसी मिथ्या और स्वार्थपर संसारकी हाय-हायमें एक दिन मर जाते और ममताके कारण
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बार-बार जन्म लेते और मरते हैं। इस तरह उनके जन्म-मरणका चक्र घूमा ही करता है।
मोह त्यागने में ही भलाई है।
मोह-ममता ही संसार-बन्धनका कारण है। ज्ञानी समझते हैं कि, यहाँ कोई किसीका नहीं है। सभी सराय के मुसाफिर हैं। राह चलते-चलते एक जगह एकत्र हो गये हैं। अपना-अपना समय होने पर, अपनी-अपनी राह ठगते हैं। न कोई किसीकी स्त्री है और न कोई किसीका पति है ; न कोई किसीका पुत्र है और न पिता ; न कोई किसीका भतीजा है और न चाचा प्रभृति। स्वार्थकी ज़ंजीरमें सब बँधे हुए हैं। फिर इन स्थायियोंका साथ भी सदा-सर्वदाको नहीं। आज साथ हैं, तो कल अलग हो जायेंगे। जन्मके सप्थ मृत्यु निश्चित है और संयोगके साथ वियोग अटल है। जब पुरुषका खीसे वियोग होता है, तब उसको बड़ा कष्ट और शोक होता है। इसी तरह पुत्रके मरने पर भी महा शोक होता है। पर जो ज्ञानी हैं, तत्त्ववेत्ता हैं, वे इस जगत्के नातोंको असलियतको जानते हैं ; अतः, या तो वे गृहस्थीको तज देते हैं या कुटुम्बियोंमें रहते हुए भी उनमें मोह-ममता नहीं रखते। जो परिवारमें रहते हुए भी, परिवारमें मोह-ममता नहीं रखते, वे जीवन्मुक्त हैं। धन्य है ऐसे नरख !
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एक निर्माही राजाकी कहानी सुनने और ध्यान देने योग्य है—
निर्माही राजा ।
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किसी नगरमें एक ज्ञानी राजा था। उसे सब निर्माही कहते थे। एक दिन उसका राजकुमार बनमें शिकार खेलने गया। उसे प्यास लगेर खे लगी। पानीकी खोजमें, वह एक मुनिके आश्रममें जा पहुँचा। मुनिने उसे जल पिलाया और पूछा—“आप किसके पुत्र हैं?” लड़केने कहा—“मैं निर्माही राजाका पुत्र हूँ।” महात्माने कहा—“राजकुमार ! एक ही मनुष्य निर्माही भी हो और साथ ही राजा भी हो, यह नितान्त असम्भव है। जो राजा होगा, वह निर्माही न होगा और जो निर्माही होगा, वह राजा न होगा।” राजकुमार ने कहा—“यदि आपको विश्वास नहीं आता; तो आप जाकर परीक्षा कर लीजिये।” मुनिने कहा—“अच्छा, हम नगरमें जाते हैं। जबतक हम न लौटें; तबतक आप यहीं ठहरे।” यह कहकर मुनि महाराज नगर को चले गये और राजभवनके द्वार पर जा पहुँचे। द्वार पर उन्हें एक दासी खड़ी मिली।
मुनिने दासी से कहा:—
॥ दोहा ॥
तू सुन चैरी रथामकी, बात सुनावौं तोहि ।
कुंवर विनास्यौं सिंहने, आसन पर्यौं मोहि ॥
( ४६० )
दासीने जवाब दिया :—
॥ दोहा ॥
ना मैं चेरी श्यामकी, नहि कोई मेरो श्याम । प्रारब्धवश मेल यह, सुनो ऋषी अभिराम ॥
इसके बाद ऋषि आगे चले, तो उन्हें राजकुमार की खी मिली । उससे उन्होंने कहा :—
॥ दोहा ॥
तू सुन चातुर सुन्दरी, अबला यौवनवान् । देवीवाहन दलमल्यौ, तुम्हरो श्रीभगवान् ॥
खी ने जवाब दिया ।
॥ दोहा ॥
तपिया पूरब जनम की, क्या जानत है लोक । मिले कर्मवश आन हम, अब विधि कीन वियोग ॥
इसके बाद ऋषिने राजकुमारकी मातासे मिलना चाहा । वे रानीके पास जा पहुँचे और उससे मिलकर उन्होंने कहा :—
॥ दोहा ॥
रानी तुमको विपति अति, सुत खायो मृगराज । हमने भोजन ना किया, तिसी मृतकके काज ॥
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रानीने जवाब दिया :—
॥ दोहा ॥
एक वृक्ष डालें घनी, पंखी बैठे आय ।
यह पाटी पीरी भई, उड़ उड़ चहूँ दिशि जायँ ॥
इसके बाद ऋषि राज-दरबारमें गये और राजासे मिले । कुशल-प्रश्न होनेके बाद, ऋषिने कहा :—
॥ दोहा ॥
राजा सुखतें राम कहू, पल-पल जात खड़ी ।
सुत खायो मृगराजने, मेरे पास खड़ी ॥
राजा ने जवाब दिया ।
॥ दोहा ॥
तपिया तप क्यों छँडियो, इहों पलक नहि सोग ।
वासा जगत सरायका, सभी सुसाफिर लोग ॥
राजाका जवाब सुनते ही ऋषि को विश्वास हो गया कि, राजा ही नहीं, राजा और राजाका सारा कुटुम्ब निर्मोही हैं ।
मनुष्यको प्रथम तो गृहस्थाश्रम में रहना ही नहीं चाहिये और यदि रहे भी, तो निर्मोही राजाकी तरह मोह त्याग-कर रहे । ममता त्याग कर गृहस्थी में रहनेसे, मनुष्य भवबन्धन में नहीं बँधता और संसार के दुःख-कलेश उसे सन्तत नहीं कर सकते । ऐसे ज्ञानीको जीवनमुक्त कहते हैं ।
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पर हम देखते हैं कि, बुढ़ापे में मनुष्य की आशा-उष्णा और भी बढ़ जाती है। बूढ़ा रात-दिन अपने बेटे-पोतों और दोहितोंकी चिन्ता में ही मग्न रहता है। आप मरनेके किनारे बैठा रहता है, तोभों पुत्र-पौत्रों के लिये धन की चिन्ता किया करता है। उसे कम-से-कम इस चला-चली की अवस्था में तो परमात्मा का भजन करना चाहिये; पर वृद्धसे यह नहीं होता। शङ्कराचार्ये कृत “मोहमुद्गर” में लिखा है :—
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुण्यीरक्तः ।
वृद्धस्तावत् चिन्तामग्नः, परमे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः ॥
बचपन में मनुष्य खेल-कूद में लगा रहता है, जवानी में युवती स्त्री में आसक्त रहता है और बुढ़ापे में चिन्ता फिकों में डूबा रहता है; लेकिन परम ब्रह्म की चिन्तना में कोई नहीं लगा रहता।
शोक चिन्ता करना वृथा है ।
यह संसार मिथ्या और नाशमान् है। यहाँ कोई किसीका नहीं। फिर वृथा शोक-फिकमें अपनी दुर्लभ मनुष्य-देहको नाश करना और जिस काम के लिये जगत् में आये हैं, उस काम की ओर ध्यान न देना, सबमुच ही भारी नादानी है। पुत्र मर गया तो क्या? स्त्री मर गयी तो क्या? धन चला गया तो क्या? जिस तरह पुत्र-स्त्री या मित्र-यार प्रभृति चले गये, मर
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गाये ; उसी तरह हम भी एक दिन मर जायेंगे ; फिर शोच किसका ? यदि वे चले जाते और हम सदा बने रहते ; तोभी शोच कर सकते थे ; पर जब सभी को जाना है, तब कौन किसका शोच करे ? कहा है—
अष्टकुलाचलसप्तसमुद्राः ब्रह्म-पुरन्दर-दिनकर-रुद्राः ।
न त्वं, नाहं, नायं लोकः, तदपि किमर्थं क्रियते शोकः ॥
हिमालय और विन्ध्याचल प्रभृति आठ पर्वत, सातों समुन्दर, ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य और रुद्र सभी अनित्य और नाशमान हैं। न तू, न मैं और न यह लोक स्थायी है ; तो फिर शोक किस लिये किया जाता है ?
मृत्युसे डरने और ध्वराने की जरूरत नहीं ।
जबतक मनुष्यको शरीर और शरीरी अथवा देह और आत्माके अलग-अलग होनेका ज्ञान नहीं होता, जबतक वह इस बातको नहीं समझता कि, आत्मा अमर, अविनाशी, नित्य और शाश्वत है ; वह कभी नहीं मरता, उसे जल डुबा नहीं सकता, आग जला नहीं सकती, हवा सोख नहीं सकती, तैल-वार बन्दूक प्रभृति मार नहीं सकती, तभी तक वह डरता और ध्वरता है। यह शरीर नाश होता है, आत्मा नहीं ; मरना, एक कपड़ा उतारकर दूसरा पहनना है ; शरीर आत्माके
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ठहरनेकी धर्मशाला मात्र है ; अगर यह धर्मशाला दूट जायगी, तो आत्मा दूसरीमें जा रहेगा,—ऐसा ज्ञान होते ही, मनुष्यके मनमें भय और भावना नहीं रहती । दुःख-सुखका सम्बन्ध शरीरसे है, आत्मासे नहीं ; आत्माको दुःख-सुख नहीं व्यापते, क्योंकि वह निराकार है,—ऐसा ज्ञान होते ही, दुःख आप-से-आप भाग जाते हैं—हाँ, मौतकी याद हरदम रखनी चाहिये, क्योंकि मौतको याद रखनेसे पाप नहीं होते और परमात्माकी शरणमें शान्ति लाभ करना ही अच्छा मालूम होता है ; पर मौतसे डरना कभी न चाहिये । जो शरीर और आत्मा में भेद नहीं समझते, वे ही मौतके नाम से काँप उठते हैं ; किन्तु जो शरीर और आत्माको जुदा-जुदा समझते हैं, जीवनमें कभी पाप नहीं करते, सदा परायी भला करते और परमात्मा को हर क्षण याद करते हैं, वे हँसते-हँसते चोला छोड़ देते हैं । भोगमपितामह कई दिनों तक शरशय्या पर लेटे रहे, उन्हें जरा भी कष्ट न मालूम हुआ । अन्तिम दिन, उन्होंने, जगदीश को याद करते-करते, यह नश्वर चोला हँसते-हँसते त्याग दिया ।
भोगम पितामह आत्मतत्त्व को पूर्णतया जानने वाले थे । वे जानते थे कि, मैं पहले भी था, अब वर्तमानमें भी हूँ और आगे भविष्यमें भी इसी तरह रहूँगा । शत्रु मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकते । हाँ, वे मेरी इस देहका नाश कर सकते हैं, पर देहके नाश होनेसे मेरी क्या हानि ? इस देहके नाश होने पर, दूसरी देह इससे ताज़ा और नई मुझे मिलेगी । मेरा आर्त्मा
( ४६५ )
नित्य और अविनाशी है, उसे नाश करने वाला जगत्में कोई भी नहीं। गीता में कहा है—
नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि, नैनं दहति पावकः ।
न चैनं द्वेदयन्त्यापो, न शोषयति माक्षतः ॥ २३ ॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
सुभको काटे, कहँ है वह तलवार ।
दाग दे सुभको, कहँ है वह नार ॥
गरम सुभको करे, कहँ है वह पानी ।
हवामें कब ताब, सुखाने की ॥
मौतको मौत, न आयेगी ।
कसद मेरा, जो करके आयेगी ॥
मौत का शोक दूर करने का सुसन्ना ।
महात्मा बुद्ध के जमाने में, किसी स्त्री का इकलौता पुत्र मर गया। पुत्र-शोक सब शोकोंसे भारी होता है; इसलिये वह स्त्री शोकाभिभूत होकर, महात्मा बुद्धके पास गयी और उनसे लड़के के जिला देने की प्रार्थना की। महात्माने कहा—“जिस घरमें कोई न मरा हो, उस घरसे थोड़ेसे राईके
३०
( ४६६ )
दाने ले आओ। अगर तुम वसे दाने ले आईं, तो हम तुम्हारे पुत्र को जिन्दा कर देगे।” वह स्त्री घर-घर पूछती फिरी; पर उसे एक घर भी ऐसा न मिला, जिसमें मौत न हुई थी। अतः वह बैरंग वापस आई और महात्मा से सारा हाल निवेदन कर दिया। सुनते ही महात्मा ने कहा—“मौत प्राणिमात्र के पीछे लगती हुई है; जो जन्मा है, वह अवश्य मरेगा। यह संसार नाशमान् है। आगे पीछे सब को इस जगत् से चल देना है। कोई सदा-सर्वदाके लिये यहाँ नहीं आया। इसलिये इसमें शोक को कोई बात नहीं। मूल ही मरे हुए का शोच किया करते हैं, ज्ञानी नहीं। ज्ञानी जानते हैं कि, आत्मा अजर, अमर, अविनाशी और नित्य है; इसीसे वे शोच नहीं करते; किन्तु मूर्ख देहको आत्मा समझते हैं; इसीसे शोक करते हैं।” महात्माका यह उपदेश सुनते ही, लीका शोक दूर हो गया और उसे परम शान्ति लाभ हुई।
भगवान् की शरण में ही सुख है।
इस जगत्में मनुष्यको किसी अवस्था में भी सुख नहीं है। फिर बुढ़ापा तो हर तरह दुःखोंको खानही है। अतः मनुष्यको जवानी में ही, आगे आनेवाले बुढ़ापेका ख्याल करके, विषयों से मनको हटा लेना और परिवार वालोंमें नामको भी मोह न रखना चाहिये। समझदारको कम-से-कम जवानीके उतारमें तो
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वर जज़ाल त्याग, बनमें जा, परमात्माकी भक्ति और उपासना करनी चाहिये। मन बारम्बार दुबाने और समझानेसे शान्त हो जाता है और धीरे-धीरे रही-सही ममता भी छूट जाती है। अस्यासके कारण, अन्तकालमें भगवतमें ही मन रहनेसे, मनुष्य की मुक्ति भी हो जाती है; यानी आवागमनसे पीछा छूट जाता है। परब्रह्मकी शरणमें चले जानेसे जो आनन्द आता है, उसे लिखकर बता नहीं सकते।
खुलासा—बुढ़ापे का चित्र देखकर, मौतको सिर पर मँडराती समझ कर, कुटुम्बियों का नाता झूठा समझ कर विषय-वासनाओंको त्यागकर, पुत्र-कलत्र और धन-दौलतको ममता छोड़कर, वैराग्यमें मन लगाओ। अच्छा हो, यदि शरीरमें शक्ति-सामर्थ्य होते हुए वरसे निकलकर बनमें जा बसो और सबसे नाता तोड़, एकमात्र परमात्मासे नाता जोड़ लो। उसका नाता ही सच्चा नाता है; और सब नाते झूठे हैं। उसकी शरणमें चले जानेसे शोक-ताप सता नहीं सकते। भगवान्को भूलने से ही मनुष्य दुःख भोगता और संसारी शत्रुओं से तंग रहता है; किन्तु जो भगवान् के चरण-कमलों में चला जाता है, उसका कोई अनिष्ट कर नहीं सकता, और शोक-ताप तो उससे हज़ार कोस दूर भागते हैं। याद रखो, परमात्माकी शरणमें चले जाने वालेसे काल और यमराज तक भय खाते हैं और ऋद्धि सिद्धि तो उसके सामने हाथ बाँधे खड़ी रहती हैं। भगवान्ने कहा है:—
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जो समीप आवै शरणाई । राखौं ताहि प्राणकी नाई ॥
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं :—
कोटि विघ संकट विकट, कोटि शत्रु जो साथ । तुलसी बल नहीं कर सकै, जो सुदृष्टि रघुनाथ ॥ राखनहारा साइयाँ, मारि न सकिहै कोय । बाल न बँका कर सकै, जो जग बैरी होय ॥
बुढ़ापेमें तो जगदीशको याद करो ।
बुढ़ापा आ जाने पर भी, जो परलोक बनानेकी सुध नहीं करते, खी-पुत्रोंकी ममतामें पड़कर, घर-गृहस्थीके जञ्जाल में फँसकर, उग्र पूरी कर देते हैं, उनकी भयङ्कर हानि और निन्दा होती है । कहा है :—
मूर्खो द्विजातिः स्थविरो गृहस्थः । कामी दरिद्रो, धनवान् तपस्वी ॥ वेश्या कुरुपा, तृपतिः कदम्यः । लोके षडेतानि विडम्बितानि ॥
मूर्ख ब्राह्मण, बूढ़ा गृहस्थ, दरिद्री कामी, धनवान् तपस्वी, कुरुपा वेश्या और स्वेच्छाचारी राजा—ये ६ अपना फ़ज़ीता और लोक-निन्दा करानेवाले हैं ॥
जो बुढ़ापे तक भी, गर्भावस्थाका किया इज़्ज़त पूरा नहीं
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करते, उनको विद्वान् और तत्त्ववेत्ता लोग पुरुष नहीं 'नपुंसक' कहते हैं। उनको बारम्बार जन्म लेना और मरना होता है। अतः बुढ़ापेमें तो मनुष्यको सब तज कर हर भजना और अपना परलोक सुधारना चाहिये।
देखिये, नीचेके चन्द्र भजनोमें कैसे मद-मोह नाश करने वाले, ग्राफ़िलोंकी ग़फ़लत छुड़ानेवाले और सौतोंको जगाने वाले उपदेश भरे पढ़े हैं :—
भजन ( राग रेखता ) ।
जो तू प्रभु-नामसे अपने, सुहृन्वत दिल बढावेगा । कहा मेरा मान ले प्यारे, फिर आवेगा न जावेगा ॥१॥ जन्म और मरण दुःख-दोज़ख, तुम्हें हरगिज़ न छावेगा । वही प्रभु-नाम तुम्हको, सब अजाबोंसे बचावेगा ॥२॥ रहेगा यादमें हरदम, कदम खादिम कहावेगा । यहाँ वहाँ—दो जहानोंमें, तुम्हें शाबाश दिलावेगा ॥३॥ समझ मक्बूल जब तुम्हको, सभी कोई सर नवावेगा । डरेगा काल भी तुम्हसे, न जम ज़ालिम सतावेगा ॥४॥ बचैगा ग़ज़ब ग़लिवसे, नहीं ग़म गैब खावेगा । मिटेगा खौफ़का स्तरा, खुशामद खुद करावेगा ॥५॥ हुकम जो मुर्शिद “बिवादास” का, दर अमल लावेगा । मिलेगा मोहन प्यारेसे, शुवा मिट सुख समावेगा ॥६॥