वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाय बुढ़ापा ॥५॥
करते थे जवानीमें, तो सब आपसे आ चाह । और हुस्न दिखाते थे, वह सब आनके दिलच्छाह।
यह कहर बुढ़ापेने किया, आह नजीर आह ! अब कोई नहीं पूछता, अल्लाह ही अल्लाह ॥
सब चीजको होता है, बुरा हाथ बुढ़ापा । आशिकोंको तो अल्लाह, न दिखलाए बुढ़ापा ॥
बुढ़ापे में निर्धनता मरण है !
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यदि मनुष्य जवानोंमें प्रचुर धन कमाकर रख देता है, तब तो बुढ़ापा सुखसे पार हो जाता है ; घरवाले हलवा और मोहन-मोग खिलाते, गरमागरम दूध पिलाते अथवा कोई और सुखसे खाये जाने-योग्य पदार्थ बना देते हैं ; यदि पास पैसा नहीं होता, तो सभी घरवाले हर तरहसे अनादर करते और सूखे टुकड़े सामने रखते हैं ; इच्छा हो बूढ़ा खाय, इच्छा हो न खाय । अगर बूढ़ेके पास धन होता है, तो खी, पुत्र, पौत्र और पुत्री तथा पुत्र-बहुएँ हर समय बूढ़ेकी हाज़िरीमें खड़े रहते हैं ; मुँहसे बात नहीं निकलती और काम हो जाता है । अगर बूढ़ेके पास धन नहीं होता, तो सब उसे त्याग देते हैं ;